Sunday, 26 August 2018

श्री कृष्ण जन्मोत्सव- Songs of Krishna

श्री कृष्ण जन्मोत्सव”

अभी कानों में कजरी और झूला के गीतों की गूँज बसी है,पर विदा लेता सावन और दस्तक देता हुआ भादो ये याद करा रहा है की तैयारी कर लो नटवर नागर “श्री कृष्ण” के पावन जन्मदिवस की.पूरे भारत में जन्माष्टमी बहुत हर्षोंउल्लास के साथ मनायी जाती है.मेरे स्वयं बचपन की बहुत सी यादें जुड़ी है,जब हम छोटे थे महीने भर पहले से ही जन्माष्टमी की तैयारी में जुट जाते थे.असल में घर-घर में कृष्ण झाँकी सजाने की परम्परा थी,जिस में घर के बडे से ले कर बच्चे तक उत्साह से भाग लेते थे. अब याद करती हूँ तो कभी-कभी हँसी भी आती है की क्या क्या बेवक़ूफ़ियाँ करते थे हम भी,कभी मित्रों के साथ घर वालों से छुप कर railway line के किनारे से पत्थर चुनने जाते थे क्यूँ की उसी पत्थर से झाँकी का पहाड़ बनता था, धूप में पसीने से लथपथ वो पत्थर चुराने का मज़ा ही कुछ और था.फिर बारी आती थी लकड़ी का बुरादा लाने और उसको अनेक रंगो में रंगने का,बुरादा भी कोई aunty या पड़ोसन मुफ़्त दे दे तो और ख़ुशी होती थी,उस रंगीन बुरादे से ज़मीन पर भिन्न-भिन्न आकृतियाँ बनायी जाती थीं जो की अक्सर मैं ही बनाती थी.अब बारी आती थी इक typical शंकर जी की मूर्ति की जिनकी जटा से pipe से गंगा जी निकाली जा सके ख़ैर अग़ल-बग़ल कहीं मूर्ति भी मिल जाती थी. ये था कि सहयोग सब लोग ख़ुशी-ख़ुशी करते थे. अब प्रबंध करना होता था कुछ plastic और metal के खिलोनों का साथ ही कुछ कृष्ण परिवार के चित्र और मूर्तियों का भी जो झाँकी में सजायी जाती थी.सबसे कठिन और मनोरंजक होता था कंस का कारागार और पहरेदार बनाना group का सबसे creative व्यक्ति ये ज़िम्मेदारी लेता था और थरमाकोल और दफ़्ती से शानदार जेल बन जाती थी,बाक़ी रह गया झूला तो बाज़ार से ले आते थे.जो पालना बना कृष्ण को हौले-हौले झुलाते रहता था. सब से ज़रूरी होता था इक “खीरा” जो उस दिन बहुत महंगा मिलता था क्यूँ की श्री कृष्ण का जन्म उसी खीरे के भीतर से करवाया जाता था.....ये तो आज तक समझ नहीं आया ऐसा क्यूँ......क्या तर्क था इस के पीछे.ख़ैर अब सारी तैयारियाँ पूरी थीं और बारी थी सजावट की तो फिर mummy या aunty की बनारसी साड़ियों पर डाका पड़ता था,जिनसे भव्य location बनती थी पत्थर के पहाड़ और उन पेट रुई की बर्फ़,पहाड़ के ऊपर शंकर जी की प्रतिमा जो जटा से गंगा जी की धारा निकालते थे जो पहाड़ से नीचे आ कर झाँकी की शोभा बढ़ाती थी.ज़मीन पर रंगे बुरादे की design के बीच-बीच में कहीं जेल तो कही पालने में कृष्ण कही यमुना में सूप में कृष्ण को उठाए वासुदेव जी तो कहीं माँ यशोदा माखन की मटकी के साथ कही गोवर्धन पर्वत के नीचे पूरा गोकुल तो कहीं गैया और गोपियों के साथ रास रचाते कन्हैया. कुछ रंग बिरंगी झंडिया,कुछ हरे-भरे गमले और कुछ light की लड़ियाँ,वाह.....क्या सज-धज होती थी.वास्तव में बड़ा मनोहारी दृश्य होता था हमारी झाँकी का,और हम अपनी मेहनत और कलाकारी पर ख़ुद ही बलिहारी जाते थे. शाम होते-होते आस-पड़ोस के लोग,परिवार और ईस्ठ-मित्र सब आ जाते थे,special भूनी धनिया और माखन मिश्री का भोग अपनी मोहक सुगंध बिखेर रहे होते थे.अब कार्यक्रम शुरू होता था गीत-संगीत का,जहाँ कृष्ण की चर्चा हो वहाँ नृत्य-गीत तो निश्चित ही रहता है,सब ढोल मंजीरा ले कर बैठ जाते और सुर से सुर मिला कर भजनों से समाँ गुंजा देते थे और फिर परम्परा अनुसार रात्रि १२ बजे पंडित जी या घर का कोई बड़ा पूरे विधि-विधान से कान्हा का जन्म करा देता, शंख नाद, घंटे और मंत्रो के शोर में नवजात क्रिशन को पालना झुला कर प्रसाद वितरण होता था,जिसका इंतज़ार हम सुबह से कर रहे होते थे. कृष्ण जन्म के बाद बधाई,सोहर और लचारी गीतों की धूम मचती थी.
कुछ ऐसे ही मनोहारी गीतों के साथ जन्माष्टमी पर आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनायें.

                         
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“नाग नथैया”

रस रस बीन बजैया काले नाग के नथइया 
रस रस ......२

केकर गेंद केकर के जी बल्ला
केकर लाल खेलैया
काले नाग के.......
सोने की गेंद चंदन के रि बल्ला 
यशोदा के लाल खेलैया
काले नाग के.....२

रस रस बीन बजैया काले नाग के नथैया
रस रस बीन....२

गेंदवा खेलत कान्हा यमुना के तट पे 
कूद पड़े यदुरैया 
काले नाग के.....२

रस रस बीन बजैया काले नाग के नथैया
रस रस बीन.....२

नाग नाथ कान्हा बाहर आये
फ़न पर नाचत कन्हाईया
काले नाग के.....२

रस रस बीन बजैया काले नाग के नथैया
रस रस बीन....२

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“दहिया पी गये”

रात श्याम सपने में आए
रात श्याम....४
दहिया पी गए सा र र र र...२

रात श्याम.....२

जबहीं श्याम मोरी बैयां पकड़ी
जबहीं श्याम......२
चूड़ियाँ कर गयी कर र र र र...२
रात श्याम....२

जबहीं श्याम ने खिड़की खोली
जबहीं श्याम....२
खिड़की कर गयी चर र र र र...२
रात श्याम.....२

जबहीं श्याम मोरी चुनरी पकड़ी
जबहीं श्याम....२
चुनरी उड़ गयी फ़र र र र र....२
रात श्याम....२

रात श्याम सपने में आए
दहिया पी गये सर र र र र....२

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“साँवली सूरत”

साँवली सूरत पे मोहन दिल दीवाना हो गया....२
दिल दीवाना हो गया मेरा दिल दीवाना हो गया....२
साँवली सूरत....२

एक तो तेरे नैन तिरछे दूसरा काजल लगाना
तीसरे नज़रें मिलाना
दिल दीवाना.....२
साँवली सूरत.....२

एक तो तेरे होंठ पतले दूसरा लाली लगी
तीसरे मुस्कुराना
दिल दीवाना....२
साँवली सूरत.....२

एक तो तेरे हाथ कोमल दूसरे मेहंदी लगी
तीसरे मुरली बजाना
दिल दीवाना....२
साँवली सूरत.....२

एक तो तेरे पावँ गोरे दूसरे पायल सजी
तीसरे घुँघरू बजाना
दिल दीवाना....२
साँवली सूरत.....२

एक तो तेरे साथ राधा दूसरे रुकमन खड़ी
तीसरे मीरा का आना
दिल दीवाना...२
साँवली सूरत....२

एक तो तेरे भोग छप्पन दूसरे माखन भरा
तीसरे खिचड़े का खाना
दिल दीवान....२
साँवली सूरत...२

एक तो तुम देवता दूसरे प्रियतम मेरे
तीसरे सपनों में आना
दिल दीवाना....२
साँवली सूरत....२

साँवली सूरत पे मोहन दिल दीवाना हो गया
दिल दीवाना हो गया मेरा दिल दीवाना हो गया .

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“ओ कान्हा”

ओ कान्हा अब तो मुरली की मधुर सुना दो तान...२
मैं हूँ तेरी प्रेम दीवानी मुझको तू पहचान
ओ कान्हा...२

जब से तुम संग मैंने अपने नैना जोड़ लिये हैं...२
क्या बाबुल क्या भैया बहना सबसे नाते तोड़ लिए हैं...२
तेरे मिलन को व्याकुल हैं कब से मेरे प्राण
मधुर सुना दो....२
ओ कान्हा.....२

सागर से भी गहरी मेरी प्रेम की गहराई...२
लोक लाज की सारी मर्यादा आज तोड़ के मैं आयी..२
मेरी प्रीत से ओ निर्मोही अब ना बनो अनजान
मधुर सुना दो...२
ओ कान्हा......२

मैया रूठी बाबुल रूठा कोई न सुनत हमारी
तेरी प्रीत के कारण हो गया सगरा जग बैरी...२
किसकी शरण में जाऊँ दुखिया तू ही बता भगवान
मधुर सुना दो...२
ओ कान्हा....२

ओ कान्हा अब तो मुरली की मधुर सुना दो तान
मैं हूँ तेरी प्रेम दीवानी मुझको तू पहचान
मधुर सुना दो तान...२

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“नज़र नहीं आते”

नज़र में रहते हो मगर नज़र नहीं आते...२
ये दिल बुलाए श्याम तुम्हें मगर तुम नहीं आते
नज़र में रहते....२

साँसो की हर डोर पुकारे साँवरिया
नैना तुझको ही खोजे साँवरिया
तू जो नैनों में आ जाए मेरे
नैनों को बंद कर लूँ साँवरिया
इधर नहीं आते साँवरे इधर नहीं आते...२
ये दिल बुलाए श्याम.....२
नज़र में रहते हो.....२

होता है आभास तुम्हारा साँवरिया
लगता है तू पास खड़ा साँवरिया...२
गिरने के पहले ही संभालोगे
हमको ये यक़ीन है साँवरिया
मेहर नहीं करते साँवरे तुम मेहर नहीं करते...२
ये दिल बुलाए श्याम.....२
नज़र में रहते हो....२

हर कोई तेरा नाम जपे है साँवरिया
हर पल तेरी राह तके है साँवरिया...२
तेरे आने की आस लिए दिल में
तक तक नैन तके है साँवरिया
ख़बर नहीं लेते हमारी ख़बर नहीं लेते...२
ये दिल बुलाए श्याम.....२
नज़र में रहते हो.....२-


नज़र में रहते हो मगर तुम नज़र नहीं आते...२
ये दिल बुलाए श्याम मगर तुम नहीं आते
नज़र में रहते हो....२

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“प्यारा श्रींगार”

कितना प्यारा है श्रींगार की तेरी लाऊँ नज़र उतार...२
लाऊँ नज़र उतार की तेरी लाऊँ नज़र उतार

साँवरिया तुमको किसने सजाया है
तुझे सुंदर सा गजरा पहनाया है
कितना प्यारा है...२
तेरी लाऊँ नज़र....२
ओ हो कितना प्यारा है...२

केसर चंदन तिलक लगा कर सज धज कर बैठे हो..२
लग गए तेरे चार चाँद की तूने पहना है जो हार..२
कितना प्यारा है...२
की तेरी लाऊँ नज़र...२

साँवरिया तेरा चेहरा चमकता है...२
तेरा कीर्तन बहुत बड़ा, दरबार महकता है
कितना प्यार है....२
की तेरी लाऊँ नज़र...२
ओ हो कितना प्यारा है....२

किसी भगत से कह कर कान्हा काली टीकी लगवा ले...२
या बोले तो तेरी राई मिर्ची दूँ उतार
कितना प्यारा है....२
की तेरी लाऊँ नज़र...२

पता नहीं तू किस रंग का है आज तक ना जान सकी
बनवारी तेरे रंग देखे हैं,बनवारी तेरे रंग देखे हैं हज़ार.....२
कितना प्यारा है....२
की तेरी लाऊँ नज़र...२
ओ हो कितना प्यारा....२

साँवरिया थोड़ा बच बच के रहना जी...२
थोड़ा मान भी लो अपने भक्तों का कहना जी..२
कितना प्यारा है...२
की तेरी लाऊँ नज़र....२

साँवरिया तेरा रोज करूँ श्रींगार....२
कभी कुटिया में मेरी आ जाओ एक बार.२
कितना प्यारा है....२
की तेरी लाऊँ नज़र...२

कितना प्यारा है श्रींगार की तेरी लाऊँ नज़र उतार...२
लाऊँ नज़र उतार की तेरी लाऊँ नज़र उतार..२
ओ हो कितना प्यारा है श्रींगार.



पूर्वांचल की महक के दो गीत “

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“टेर के बाँसुरिया”

टेर के बाँसुरिया टेर के बाँसुरिया 
मोहन भयिलें रसिया 
रसायी गयीले ना 
टेर टेर के बाँसुरिया रसाई गयीले ना 
टेर के.....३

हाथों में व्रज सोहे कानन में कुण्डल...२
होंठवा पे सोहेला,होंठोवा पे सोहेला
बाँस के मुरलियाँ....२
रसाई गयीले ना....२
टेर के....२

इनके बाँसुरिया पे नाचें राधा रानी...२
इनके बाँसुरिया पे नाचें गोप गोपियाँ...२
रसाई गयीले ना....२
टेर के....२

टेर के बाँसुरिया मोहन भयिलें रसिया 
रसाई गयीले ना 
टेर टेर के बाँसुरिया रसाई गयीले ना 
टेर के....२

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“मोहन”

आ जाओ मेरे मोहन भैया 
अब लाज उतरने वाली है....२
आ जाओ हे यशोदा के छईया
अब लाज....२
आ जाओ....२

दुशासन अत्याचारी है
वो कर से खींचत सारी है...२
आ जाओ हे लाज के रखवैया
अब लाज...२
आ जाओ...२

मेरे पाँचो पती सब मौन हुए 
कौरव भी सभासद घेरे हुए...२
आ जाओ हे चीर के रखवैया
अब लाज....२
आ जाओ....२

जब मोहन तुमको चोट लगी
और ख़ून की धारा बह निकली...२
जिस चीर से बाँधा था भैया
वो चीर उतरने वाली है...२
आ जाओ हे चीर के रखवैया
अब लाज...२
आ जाओ...२

आ जाओ मेरे मोहन भैया 
अब लाज उतरने वाली है..२
आ जाओ हे यशोदा के छईया
अब लाज उतरने वाली है.

Friday, 10 August 2018

“कजरी के गुलदस्ते में कुछ और पुष्प”


“कजरी के गुलदस्ते में कुछ और पुष्प”

                                   
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“ननद भाभी”

कैसे खेलन जैबू सावन मा कजरिया
बदरिया घिरी आयी नन्दी....२
हम तो खेलन जाईब सावन में कजरिया
बदरिया का बिगाड़ी भौजी...२

तू त जात हौ अकेली कौनो संग ना सहेली
छैला रोक लीहें तोरी डगरिया
बदरिया घिरी आयी नन्दी...२

भौजी बोल ना ऐसन बोली जियरा लागे जैसे गोली
कैसे रोक लीहे छैला डगरिया
बदरिया घिरी आयी नन्दी....२

कैसे खेलन जैबू सावन मा कजरिया
बदरिया....२

कितने फाँसी चढ़ के मरी गय
कितने ज़हर खा के मरी गय
कितने पीसत बाँटे जेल में चकरिया
बदरिया घिरी आयी नन्दी....२

कैसे खेलन जैबू सावन मा कजरिया
बदरिया...२
हम तो खेलन जाईब सावन मा कजरिया
बदरिया का बिगाड़ी भौजी

कैसे खेलन जैबू सावन मा कजरिया
बदरिया....२
हम तो खेलन...२

                                 
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“मनिहारी”

अरे रामा कृष्ण बने मनिहारी
ओढ़ लिनी सारी ऐ हरी...२

राधा से मिलन के बहाना खोज लिहले कृष्ण कन्हैया
पावँ में बाजत पैजनिया माथे पे साजे टिकूलिया...२
अरे रामा सूरत लगे बड़ी प्यारी
ओढ़ लिनी सारी ऐ हरी..२

अरे रामा कृष्ण बने....२

मथवा पे रंग बिरंगी चूड़ियाँ की भरल डलिया
फेर लगावत घूम गोकुल के गलियाँ गलियाँ...२
अरे रामा नैना लगेला कटारी
ओढ़ लिनी सारी ऐ हरी...२

अरे रामा कृष्ण बने....२

कान्हा के टेर सुन के बाहर आयी राधा
चूड़ीहारी कृष्ण जी के घर लायीं राधा
अरे रामा चूड़ियाँ दिखाये मनोहारी
ओढ़ लिनी सारी ऐ हरी...२

अरे रामा कृष्ण बने...२

चूड़ी पहिनावे कन्हैया राधा के दबावे कलाईयाँ
जानि गैली राधा ये तो है हमरे कृष्ण कन्हैया...२
अरे रामा मिलन लगे सुखकारी
ओढ़ लिनी सारी ऐ हरी...२

अरे रामा कृष्ण बने मनिहारी
ओढ़ लिनी सारी ऐ हरी....२
         
                               
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“रिमझिम”

अरे रामा रिमझिम से बरसे ला पनिया
चली तो आओ जनिया ऐ हरी....२

सर के बाल हैं काले रामा मोतियन माँग सँवारे रामा...२
अरे रामा चोटियाँ में लगे झुनझुनीया
चली तो आओ जनिया ऐ हरी...२

अरे रामा रिमझिम से बरसे पनिया
चली तो....२

होंठो पे पान के लाली रामा दातों में मिसरी की डलिया रामा...२
अरे रामा नैना बनी है कमनियाँ
चली तो आओ जनिया ऐ हरी...२

अरे रामा रिमझिम से बरसे ला पनिया
चली तो....२

पहनूँ बनारस की साड़ी रामा लागी गोटा किनारी रामा...२
अरे रामा चलिया कटी है मुल्तनिया
चली तो आओ जनिया ऐ हरी...२

अरे रामा रिमझिम से बरसे ला पनिया
चली तो...२

कड़ा छड़ा पाज़ेब नौलखा
अरे रामा कमर में सोहे करधनिया
चली तो आओ जनिया ऐ हरी...२

अरे रामा रिमझिम से बरसे ला पनिया
चली तो आओ जनिया ऐ हरी...२

Monday, 30 July 2018

“आया सावन झूम के”


ऐसा लगता है जैसे धरती ने फिर एक बार स्नान कर के धानी चुनरिया ओढ ली है चारों ओर हरियाली छायी हुयी है.हर पत्ता हर बूटा रिमझिम फुहार से धुल कर चमक उठे हैं.ये है सावन का महीना जब धरती अपने पूरे सौंदर्य पर होती है.पपिहा,झिंगुर मोर अपने स्वर व सौंदर्य से सब का मन मोह लेते हैं.
स्त्रियाँ सखी सहेलियों के साथ सजती सँवरती है पेड़ों पर झूले पड़ जाते है,गोरियों की कलाइयाँ हरी हरी चूड़ियों और मेहंदी से सज जाती है और फिर शुरू होती है रिमझिम फुहार के साथ लय मिलाते हुए ढोलक के साथ कजरी गाने की.......अब आप सोच रहे होंगे की कहाँ होता है ये सब बस किताबी बातें हैं,जी हाँ सच है आज की मशीनी ज़िंदगी में ये सब लोग भूलते जा रहे हैं ना तो झूले पड़ते हैं ना वो समय है ना वो लोग जो कजरी गाते है. पहले आप को कजरी के बारे में बता दूँ ,लोकगीतों में कजरी वो विधा है जो केवल सावन,भादों में गायी जाती है अपने अनूठे रंग रूप में,कजरी गाने की राग भी बहुत अलग होती है.पहले तो पूरे सावन भादों घर-घर स्त्रियाँ टोली बना कर ढोल मंजीरे के साथ सुर मिला कर कजरी,झूला गा कर समां बाँध देती थी.
अब तो किसी महोत्सव में एक दिन का स्थान मिल जाए ऐसे गीतों को यही बहुत हैं.ग़लती हमारी है हमें ही अपनी नयी पीढ़ी को अपनी विरासत से परिचित कराना चाहिये.
ये देख कर ख़ुशी होती है की कुछ-कुछ जगहों पर आज भी स्त्रियाँ चाहे तीज celebrate करने के लिए या club gathering के बहाने ही सावन,झूला और कजरी गाने का कार्यक्रम रखती हैं इसका सबूत आप लोगों के Facebook status से देख सकते हैं,पर दुविधा ये होती है की कजरी बहुत कम लोगों को आती है,तो चलिए कुछ बहुत ही लोकप्रिय और मनमोहक कजरी गीतों का गुलदस्ता आप सब के लिए इस सावन पर सप्रेम भेंट.



“जैसा कि कजरी के परिचय में आप जान चुके हैं की इन गीतों में स्त्रियों के हार-सिंगार मेहंदी-झूला प्रकृति का वर्णन और बहुत सी चुहलबाज़ी होती है तो साथ ही ये सावन का माह भगवान “शिव” की आराधना के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है,और जहाँ झूला हो गीत हो रस हो वहाँ “श्री कृष्ण” का का नाम कैसे ना हो,इसलिए अधिकतर गीतों में इन सब का वर्णन मिलता है.

                     
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“गोदना”

अरे रामा गोदना,ग़ोदावे केहु प्यारी
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी...२

केहु ग़ोदावे नाम पति के केहु ओम् 
ग़ोदावे रामा
अरे रामा केहु 
अरे रामा केहु ग़ोदावे बनवारी 
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी 

अरे रामा गोदना ग़ोदावे केहु प्यारी 
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी...२

केहु ग़ोदावे सीता राम केहु शंकर 
ग़ोदावे रामा 
अरे रामा केहु 
अरे रामा केहु ग़ोदावे गिरधारी
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी

अरे रामा गोदना ग़ोदावे केहु प्यारी
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी...२

केहु ग़ोदावे राधे श्याम हनुमत 
केहु ग़ोदावे रामा
अरे रामा केहु 
अरे रामा केहु ग़ोदावे मुरारी 
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी....२

अरे रामा गोदना ग़ोदावे केहु प्यारी 
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी...२
 

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“आये सावन”

आए सावन ओ मनभावन
लखिए बरखा की बहार
आए सावन..२

गुल्म लता तरु बेल सुहावन
फूले फूल हज़ार साँवरिया
फूले फूल हज़ार...२

आए सावन ओ मनभावन
लखिए बरखा की बहार
आए....२

जूही चम्पा चमेली फूले
फूल रहे कचनार
फूल रहे कचनार साँवरिया
आए....२

आए सावन ओ मनभावन
लखिए बरखा की बहार
आए.....२

दादूर मोर पपिहा बोले
झींगूर की झनकार
झींगूर की झनकार साँवरिया
आए....२

आए सावन ओ मनभावन
लखिए बरखा की बहार
आए....२

राम लली सत की पटरी पर
झूलत बारम्बर साँवरिया
झूलत बारम्बर
आए...२

आए सावन ओ मनभावन
लखिए बरखा की बहार
आए....२

                               
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“मोती झील”

पिया मेहंदी मँगाई दा मोती झील से
जा के साइकिल से ना...२

हमके मेहंदी मँगाई दा छोटकी 
नन्दी से पिसवाई दा
हमरे हाथे पे लगाई दा काँटे जीर से 
जा के साइकिल से ना 
पिया मेहंदी....२

ई है सावनि बहार माना बतिया हमार 
कौनो फ़ायदा ना निकली दलील से 
जा के साइकिल से ना....२

पिया मेहंदी मँगाई दा मोती झील से 
जा के साइकिल से ना...२

पकड़ लई बाग़बान चाहे हो जाए चालान
तोहके लड़ के छुड़ा लेब अपील से 
जा के साइकिल से ना....२

पिया मेहंदी मँगाई दा मोती झील से 
जा के साइकिल से ना...२

Friday, 15 June 2018

नमस्कार।  
इंटरनेट की इस विशाल दुनिया में आप "संझा -भोऱ " नाम के इस ब्लॉग तक पहुंचे , इसके लिए आप को बधाई।  आपका स्वागत है. आइये, यहीं से शुरुआत करते हैं. यदि अब भी आपको गांव या छोटे शहरों की शादियों में  जाने का,  और कुछ दिन रुकने का, मौका मिलता है तो आप समझ  पाएंगे  की कैसे सुबह की नींद गांव की औरतों के गाने से "disturb " होती है.  कुछ  बुजुर्ग औरतें हर सुबह शाम अपनी टोली सी बना के, पुरानी सी दरी बिछा के , कुछ सुने सुनाये से गीत गा  रही होती हैं.  इन गीतों की धुन आपको जानी पहचानी सी  लगती है ,  मन में दोहराते भी हैं - पर यह गीत बढ़ते वक़्त के साथ कहीं छूट गयें हैं. इसी भूली बिसरी धरोहर से आपको दोबारा  जोड़ने का प्रयास है- Sanjhaa-Bhor

हमारे गीतों  का संकलन आपके लिए पुराने लोक संगीत का आनंद उठाने की एक नयी खिड़की खोलेगा। 
पढ़िए और गांव की शादियों को, दादी की कहानियो को, घर के पुराने आँगन को याद करिये.  

Wednesday, 21 March 2018

चैत की गुनगुनाती धूप




अभी फ़ागुनी रंग और फ़ाग़ के सुरों की खनक बाक़ी ही थी की,नववधु की तरह मंथर व सुरीली चाल के साथ ही चैत की गुनगुनाती धूप और महकती हवा ने हमारे दिलों पर दस्तक दे दी.
             यही तो ख़ासियत है हमारी पुरानी परम्पराओं की,कोई भी मौसम हो या कोई भी त्योहार सबकी अपनी ख़ास अहमियत है और अपनी पहचान.ऐसा ही ख़ास मौक़ा होता है चैत महीने का,ये वो समय होता है जब खेतों में गेहूँ की सुनहरि बालियाँ लहलहा रही होती हैं और किसान उनकी कटाई का आयोजन करते हैं. ये सबके लिए बहुत ख़ुशी का मौक़ा होता है किसान को अपने परिश्रम का फल मिलता है घर में सुख व समृद्धि आती है,इसलिए चैत मास में लोग बडे उमंग व उत्साह से भरे होते है साथ ही इस माह में "चैता" या "चैती" गाने की बड़ी पुरानी परम्परा है. ऐसा खेतों में कटाई के समय काम करते-करते भी गाते है और अक्सर शाम को कटाई के बाद गाँव के चौपाल पर जब लोग जमा होते हैं तो दिन भर की जी तोड़ मेहनत के बाद कुछ आनंद के पल गा बजा कर ख़ुश हो लेते थे."थे" मैंने इस लिए लिखा कि धीरे-धीरे ये परम्परायें कहीं खोती जा रही है. मुझे बहुत दुःख होता है जब मैं देखती हु की ऐसे गीत या परम्परायें अब केवल कुछ बडे शहरों में होने वाले आयोजनो की शोभा बन कर ही रह गयी हैं,उनका वास्तविक स्वरूप कहीं खो गया हैं.
          इसीलिए मैंने एक छोटा सा प्रयास  किया है कि ऐसे भूले-बिसरे गीत "संझा-भोर" के माध्यम से आप तक पहुँचा सकूँ.
      तो चलिये आप को चैता और चैती के बारे में कुछ रोचक बातें बता दूँ.....जैसा कि पहले ही बता चुकी हूँ मूलतः ये फ़सल की कटाई पर आधारित होता है,गाने मस्ती भरे होते हैं,अक्सर विवाहित स्त्रियाँ फागुन में मायक़े गयी होती हैं और उनके ससुराल लौटने का समय भी होता है तो,संयोग और वियोग रस का भी आनंद होता है.अधिकतर चैता या चैती समूह में ढोलक की थाप और मंजीरे की झनकार के साथ ही होता है.चैता गाने की राग बहुत अलग व मनभावन होती है,ये classical और लोकगीत दोनो रूपों में गाया और बहुत पसंद किया जाता है .तो लीजिए कुछ पारम्परिक चैता,चैती का आनंद.
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"सूतल सैयाँ"


अरे साँझ के बेर थाकल हारल
आइ के सजन सूतल परल बा,
अरे कोयल कूक से हूक उठे,
कहीं जागे ना बालम प्राण डरल बा.

सूतल सैयाँ के जगावे हो रामा
कोयल बड़ी पापी -३
कोयल बड़ी पापी कोयल बड़ी पापी 
सूतल सैंया के.......२

रोज रोज़ बोले कोयल साझँहो
बिहनवा -२
आज बोलेलू आधी रतिया 
कोयल बड़ी पापी 
ज़री से कटैबो खनी बगिया हो रामा 
कोयल बड़ी पापी -२
सूतल सैयाँ के.......२
कोयल बड़ी पापी 

होवे द सवेर कोयल खोतवा उज़रबो
होवे द.....२
अरे ज़री से कटेबो खनी बगिया हो रामा 
कोयल बड़ी पापी 
सूतल सैंया के....२
कोयल बड़ी पापी .

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"नयी झूलनी "

नयी झूलनी की छैयाँ बलम 
दूपहरिया बिताई जा हो....३

चार महीना है गरमी के दिनवा
अरे चार महीना 
तर तर चुवे पसीनवा बलम तनी
बेनिया डोलाई जा हो......२
नयी झूलनी की.......२

चार महीना बरखा के दिनवा
अरे चार महीना 
रिमझिम,अरे,रिमझिम बरसे सवनवा 
बलम तनी बंगला छवाई जा हो 
रिमझिम बरसे....२
नयी झूलनी की....२

चार महीना है जाड़ा के दिनवा
अरे चार महीना 
थर थर काँपे बदनवा बलम तनी 
गरवा लगाई ला हो 
अरे,थर थर....२
नयी झूलनी की...२


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"गोरी बहियाँ"

हो,रामा गोरी गोरी बहियाँ.....३
हरी हरी चूड़ियाँ हो रामा चैत मासे...२
हो रामा गोरी गोरी बहियाँ

चैता मासे झूलनी गढ़ाईब हो गोरी चैता मासे......३
ऐ रामा गोरी गोरी बहियाँ....२

ऐ गोरी घर से जब निकर 
ऐ गोरी...३
अरे कजरा लगाई लिहल कर गोरे गलवा
अरे कजरा....२
टोनहा बा सबके नज़रिया हो रामा 
तनी बची के....२
ऐ रामा गोरी गोरी बहियाँ...२

ऐ गोरी जुल्मी तोरी अँखियाँ
ऐ गोरी जुल्मी तोरी अँखियाँ
अरे,हमके सतावे सारी रतिया 
बाँके नैना 
अरे हमके सतावे.....२
ऐ रामा गोरी गोरी बहियाँ....२

ऐ गोरी सुतेलि हम खरिहानी
अरे ऐ गोरी सुतेलि......२
सुतेलि हम खरिहानी
अरे हमके बुलाईं लिहल कर सेजिया
हमके बुलाईं.....२
ऐ रामा गोरी गोरी बहियाँ.


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"अमवाँ"

सब बन अमवाँ बहोरब हो रामा चैत महिनवा....३

कौने मासे अमवाँ बौरन लगे
कौने मासे लागे ला टिकोरवा हो रामा चैत महिनवा 
कौने मासे......२

माघे मासे अमवाँ बौरन लागे
चैत मासे लागे ला टिकोरवा हो रामा चैत महिनवा
माघे मासे......२

सब बन अमवाँ बहोरब हो रामा चैत महिनवा....२

कौने मासे गोरीया बिरहन लागें
कौने मासे कूके कोयलीया हो रामा चैत महिनवा
फागुन मासे गोरीया बिरहन लागे
अरे चैत मासे कूके कोयलिया हो रामा चैत महिनवा.....२

सब बन अमवाँ बहोरब हो रामा चैत महिनवा.

Tuesday, 6 February 2018

"शिवरात्रि विशेष "




सौभाग्य शाली होते है वो लोग जिन्हें बचपन में दादा,दादी, और नाना,नानी, की गोद उनका प्यार,दुलार बहुत सारी सीख और कहानियाँ सुनने को मिलती हैं.
         दादा,दादी का तो साथ मुझे मिला और उनसे बहुत कुछ सीखने को भी मिला,हम तीन भाई बहन हैं और बिगड़े हुए बच्चे माने जाते हैं जिसकी ज़िम्मेदारी दादा,दादी को ही जाती हैं.
            किंतु ,दुर्भाग्य वश मैं अपने नाना,नानी को देख भी नहीं पायी मैं जब बहुत छोटी थी तभी उनका देहांत हो चुका था.मैंने अपनी माँ से ही उनके बारे में सुना है और जो सुना है वो बहुत ही असाधारण  व आश्चर्यजनक है,विशेषकर मेरी नानी के बारे में वो उतने पुराने ज़माने में भी काफ़ी पढ़ी-लिखी व बहुमुखी प्रतिभा की धनी थी.ईश्वर ने उन्हें गीत-संगीत,सीना-पिरोना जैसे अनेक कलाओं से सजाया था,वे अपने गीत ख़ुद लिखती थी और संगीत बद्ध भी करती थीं और वो निश्चय ही अमूल्य हैं.उनके अधिकतर गीत राग,रागिनियो और मौसम पर आधारित होते थे.आज ये बताते हुए मुझे बहुत दुःख हो रहा है की मेरी नानी जी द्वारा लिखे बहुमूल्य गीत व कविताओं का कोई संकलन नहीं हो सका,शायद तब लोगों ने उसका सही आंकलन नहीं किया,उस अमूल्य धरोहर को खोने का दर्द मैं बता नहीं सकती.
        हाँ, कुछ गाने हैं जो मेरी माँ और मामी लोगों के स्मृति में अभी संचित हैं. अभी मौक़ा भी है और दस्तूर भी देवों के देव "महादेव" का महा पर्व शिव रात्रि क़रीब है और इस पावन अवसर पर मैं अपनी नानी को श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए उनके कुछ भजन आप तक पहुँचा रही हूँ.
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"शंकर दयाल"

लीजे शंकर दयाल ख़बरिया मोरी
हाँ,लीजे शंकर दयाल 
लीजे शंकर .

जग में गंग बहे पाप नाशक दुःख हरनी 
जग में गंग बहे 
इसी से नाम जगत में तारण तरनी 
इसी से नाम 
हरी द्वारे पे मोक्षत कीजे मोरी 
लीजे शंकर .
हाँ,लीजे शंकर दयाल 


भाल पे चन्द्र तिलक तीन नेत्र साजे हैं
भाल पे चन्द्र 
हाथ डमरू भी लिए नंदी पे विराजे है 
हाथ डमरू भी 
आओ दीन दयाल नगरिया मोरी 
आओ दीन दयाल .

लीजे शंकर दयाल ख़बरिया मोरी 
हाँ,लीजे शंकर दयाल 
लीजे शंकर .

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"नमन"

नमः हो नमः हो नमः प्राणदाता 
नमः हो नमः हो नमः प्रियदाता 
नमः हो .

नमस्ते निराकार निर्दोष नायक 
नमस्ते परम मित्र सबके सहायक 
नमस्ते निराकार 
नमस्ते परम .


नमो दुःख भँजन नमस्ते निरंजन 
नमो सच्चिदानंद घट घट के व्यापक 
नमो दुःख 
नमो सच्चिदानंद.
नमो नाड़ियों नस के बंधन से बाहर 
नमो सर्व आधार किरपा के सागर 
नमस्ते निराकार .
नमस्ते परम .

नमः हो नमः हो नमः प्राणदाता 
नमः हो नमः हो नमः प्रियदाता 
नमस्ते निराकार 
नमस्ते परम.

तुम्हीं को नमस्ते है हे जन्मदाता 
तुम्हीं को नमस्ते है सायं और प्रातः 
तुम्हीं को नमस्ते
तुम्हीं को नमस्ते है सायं और प्रातः 

नमः हो नमः हो नमः प्राणदाता 
नमः हो नमः हो नमः प्रियदाता 
नमः हो .


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"शंकर"


शंकर तेरी जटा से बहती है 
गंग धारा 
शंकर तेरी जटा से बहती है 
गंग धारा 
काली घटा के अंदर जिमी यामीनि
उज़ारा
शंकर तेरी 

द्रिग तीन तेज़ राशि कटी कंध 
नाग फाँसी
गिरिजा है संग दासी 
सब विस्व के आधारा
शंकर तेरी 

गले मुण्ड माल राजे शशि भाल 
पे विराजे 
डमरू निदान बाजे 
कर में त्रिशूल भाला
शंकर तेरी 

शंकर तेरी जटा से बहती है 
गंग धारा
काली घटा के अंदर जिमी यामीनि 
उज़ारा 
शंकर तेरी .


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"शिव"

जटा में गंगा जी बहार करें
भक्तों का बेड़ा शिव पार करे 
जटा में 
भक्तों का 

शिव जी बैठे भभूति रमाए
गले सर्पों का हार सुहाये
डमरू मधुर झनकार करे 
अरे,डमरू मधुर झनकार करे 
भक्तों का 
जटा में 

रटे जो नित नित बम बम भोला 
निर्मल होवे उसका चोला 
दर्शन जो जन इक बार करे 
भक्तों का 
जटा में 

ओढ़े बाबा जी बाघम्बेर
काँधे सोहे जनेउ सुंदर 
अरे भांग धतूर आहार करे 
भांग धतूर का आहार करे 
भक्तों का 
जटा में 

नंदी गण सोहत हो ऐसे 
सागर मध्य कमल हो जैसे 
अरे मस्तक पर चंदा उज़ियार करे 
मस्तक पर चंदा उज़ियार करे
भक्तों का 
जटा में गंगा जी बाहर करे 
भक्तों का बेड़ा शिव पार करे .