भोजपुरी और बॉलीवुड का बहुत पुराना रिश्ता रहा है. यदि हम थोड़ा पीछे जायें तो ये स्पष्ठ रूप से दिखता है, कहानी क्यूँ की अक्सर उत्तरी भारत के गाँव या शहर से प्रभावित होती थी तो भले ही सिनेमा की भाषा खड़ीबोलि यानी हिंदी होती थी पर गीतों में लोक संगीत का वर्चस्व भरपूर दिखता है. और मज़ेदार बात ये है की ये गीत इतने लोकप्रिय हो गये की पिछले कई दशकों से अब तक हमारा मनोरंजन करने के साथ ही हमारे दिलों पे आज भी राज़ कर रहे हैं. बहुत पुराने समय की बात करें तो अधिकतर फ़िल्में कलकत्ता में बनती थीं,तो स्वाभाविक है की बांग्ला पृष्ठ भूमि की गहरी छाप होती थी और ये तो सर्व विदित है कि बंगाल का साहित्य,संगीत,संस्कृति व कला न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में गरिमामयी दृष्टि से जाना पहचाना जाता है. कहने का अर्थ सिर्फ़ इतना है की उस दौर के सिनेमा के संगीत को देखें तो बांग्ला लोक संगीत का जैसे अक्स उतर आता था गीतों में जो अपनी मधुरता व रोचक होने के नाते बहुत पसंद किया जाता था. चलते फिरते यदि कभी ऐसी कोई पुरानी धुन आज भी सुनायी पड़ जाती है तो मन को जैसे शीतल स्पर्श सा कर जाती है .
Saturday, 17 October 2020
भोजपुरी और बॉलीवुड
ये कहना ग़लत नहीं होगा की हमारी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति की जहाँ भी छाप पड़ती है और लोक का रंग बिखर जाता है वो चाहे किसी भी विधा का मनोरंजन हो या कला ,वो सीधे आप के अंतर्मन को छू जाता है और तन-मन प्रफुल्लित हो जाता है .इसीलिए भारतीय सिनेमा में जब जब लोक संगीत का प्रयोग हुआ हर बार सफल तो रहा ही साथ ही इन गीतों की धूम मच जाती थी. बात केवल भोजपुरी लोक संगीत की नहीं है,अगर आप आज देखें तो फिर लोक संगीत ही bollywood में छाया हुआ है हाँ भाषा ज़रूर बदल गयी है अब चारो ओर पंजाबी लोक संगीत ने धूम मचा रखी है,ये लोक संगीत का ही जादू है की वो हर किसी को गुनगुनाने पर मजबूर कर देता है . तो लीजिए इस बार कुछ ऐसे गीत आप के लिए लायी हूँ जो bollywood से हैं पर पूरी तरह से लोक संगीत से प्रभावित है और ऐसा नहीं है की ये गीत आप ने सुने नहीं होंगे,आप निश्चित ही इन गीतों से परिचित होंगे , मेरा प्रयास तो सिर्फ़ आप को इक बार फिर उन अद्भुत गीतों के संसार में पहुँचाने का है.तो आनंद लीजिए कुछ bollywoodia संगीत का. अगले post तक के लिए विदा व नमस्कार .🙏
“पिपरा के पतवा “
पिपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा
की हियरा में उठत हिलोर
पुरवा के झोंकवा से आयो रे
सनेसवा की चल अब देसवा की ओर...2
पिपरा के पतवा.....2
झुकी झुकी बोले काले काले ये बदरवा...2
कब से पुकारे तोरे नैनों का कजरवा......2
उमड़ घुमड़ जब गरजे बदरिया रे
ठुमक ठुमक नाचे मोर.....2
पिपरा के पतवा......
पुरवा के झोंकवा से...2
सिमिट सिमिट बोले लम्बी ये डगरिया
जल्दी जल्दी चल राही अपनी नगरिया....2
रहिया तकत बिरहिनिया दुल्हनिया
रे बंध के लगनिया की डोर....2
पुरवा के झोंकवा से.....2
पिपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा
की हियरा में उठत हिलोर
पुरवा के झोंकवा से आयो रे
सनेसवा की चल अब देसवा की
“गेंदा फूल “
ओय होय होय ओय होय....2
सैंया छेड़ देवे ननद चुटकी लेवे
ससुराल गेंदा फूल...2
छोड़ा बाबुल का अंगना
भावे डेरा पिया का...2
सास गारी देवे देवर जी
समझा लेवे
ससुराल गेंदा फूल
सैंया छेड़.....2
सैंया हैं व्यापारी चले है परदेस
सूरतिया निहारू जियरा
भारी होवे....2
ससुराल गेंदा फूल...2
सास गारी देवे.....2
बुशट पहिन खायी के बीड़ा पान
पूरे रायपुर से अलग है
सैंया जी की शान...2
ससुराल गेंदा फूल...2
सैंया छेड़ देवे...2
सास गारी देवे देवर जी
समझा लेवे
ससुराल गेंदा फूल
सैंया छेड़ देवे ननद
चुटकी लेवे
ससुराल गेंदा
“नैन लड़ जैहें”
“लागा गोरी गुजरिया से नेहा हमार
होई गवा चौपट सारा मोरा रोज़गार”
नैन लड़ जैहें तो मनवा मा
कसक होईबै करी
प्रेम का छूटीहै पटाखा
तो धमक होईबै करी...2
रूप को मन मा बसईबा तो
बुरा का होईहै...2
कोहू से प्रीत लगईबा तो
बुरा का होईहै
प्रेम की नगरी में कुछ हमरा
भी हक़ होईबै करी...2
नैन लड़ जईहैं....2
प्रेम का छूटीहै....2
होई गवा मन मा मोरे
तिरछी नज़र का हल्ला...2
गोरी को देखे बिना निदियाँ
ना आवे हमका
फाँस लगिहे तो करेजवा
मा कसक होईबै करी...2
नैन लड़ जईहैं...2
प्रेम का छूटीहै ....2
आँख मिल जैहें सजनिया
से तो नाचन लगिहै
प्यार की मीठी ग़ज़ल
मनवा भी गावन लगिहै...2
झाँझ बजिहै तो कमरिया
मा लचक होईबै करी....2
नैन लड़ जैहें....2
प्रेम का छूटीहै...2
नैना जब लड़ीहैं तो भैया
मन मा कसक होईबै करी..2
मन ले गयी रे धोबनिया रामा
कैसा जादू डार के...2
कैसा जादू डार के रे
कैसा मंतर मार के....2
“डोली कंहार”
जल्दी जल्दी चल रे कंहारा
सुरुज डुबे रे नदिया...2
लचकत डोलिया डोलावे
गोरी के छुई मुई देहिया
जल्दी जल्दी....2
चाहे कहीं दाना चुगे
पानी पिए सुगना
सँझिया के बेरिया
उ खोजे आपन खोतवा
वैसहि दुल्हिनिया के ललके
परनवा उड़ी के पहुँच जाई
पिया के अंगनवा....2
चम चम सेनुरा चमके...2
दम दम दमके सुहाग बिंदिया
जल्दी जल्दी....2
जा के ससूर्रिया गरब जिन करिहा
सब के उठा के तू पलकिया पे रखिहा
बड़े के आदर दिहा छोटे के सनेहवा
इहे बा हो सुघर जिनगी के सनेसवा
दोनो कुल के इज्जत रखिहा
बोलिहा जिन तेज बोलिया
जल्दी जल्दी....2
डोली रुकी जैसे ही पिया के नगरिया
अरे शोर उठी आ गैलि नयकी बहुरिया
आगे आगे बँधले पिया संगे गंठिया
दौरा में डेग धरी चलबु डगरिया
ऐसहि संभल के ऐ गोरी
चलिहा जिनगी के रहिया
जल्दी जल्दी....2
जल्दी जल्दी चल रे कंहारा
सुरुज डुबे रे
“अंबरसरिया”
गली में मारे फेरे
पास आने को मेरे
कभी परखता नैन मेरे
वो कभी परखता तोल...2
अंबरसरिया मूँडया वे
कचियाँ कलियाँ ना तोड़
तेरी माँ ने बोले है मुझे
तीखे से बोल
अंबरसरिया.....2
कोरी कोरी मेरी कलाई
कोरी कोरी मेरी कलाई
चूड़ियाँ काली काली.....2
मैं शरमाती रोज़ लगाती
काजल सूरमा लाली
नहीं मैं सूरमा पाणा
रूप ना मैं चमकाना....2
नैन नशीले हों अगर तो
सुरमे की की लोंड....2
अंबरसरिया मूँडया वे
कचियाँ कलियाँ ना तोड़
तेरी माँ ने बोले हैं मुझे
तीखे से बोल....2
अंबरसरिया.....2
Thursday, 21 November 2019
निर्गुण गीत
हमारे लोक संगीत के ख़ज़ाने में ऐसे-ऐसे अनमोल रत्न हैं,ऐसी अनोखी बातें हैं जिनको जान कर सुन कर ख़ुद हैरानी होती है की हमारे पूर्वज कितने ज्ञानी व गुणी थे,जो इतने कम संसाधनो में भी अपनी बुद्धि के प्रयोग से ऐसे-ऐसे गीतों की रचना कर गए है जो आज भी प्रासंगिक हैं,सार्थक हैं और मनोरंजन के साथ साथ कुछ सीख भी दे जाते हैं.बस आवश्यकता है की हम उन की क़द्र कर सकें,उन्हें सुने समझें व किसी न किसी तरह इस पीढ़ी व आने वाली पीढ़ी तक पहुँचा सकें.
तो चलिए इस बार आप को परिचित कराते हैं “निर्गुण गीतों” से.निर्गुण गीत मूलतः वे गीत हैं जिन में जीवात्मा-परमात्मा सम्बंधी बातें प्रतीक रूप में कही जाती हैं.ये निर्गुण गीत “निर्गुण संत सम्प्रदाय” की भावना पर आधारित होते हैं लेकिन ऐसे फ़क़ीरों के ये गीत या भजन कठिन या अस्पष्ट नहीं वरन भाव-प्रवण व सहज हैं.ऐसे बहुत से गीतों की आख़री पंक्तियो में #कबीर दास जी का नाम आता है किंतु दावा नहीं किया जा सकता है की सभी उन्ही की रचना हैं.ऐसे ही अवधी में कई बार #अमीर खुसरो जी का भी नाम आता है.इन गीतों का चलन पुरातन समय से अब तक चला आ रहा है,साथ ही ऐसे गीत #भोजपुरी या #अवधी भाषा में ज़्यादा गाये जाते हैं,इस का कारण शायद ये है की इन को लिखने वाले इन्हि इलाक़ों से थे.इसीलिए निर्गुण गीतों की सुदीर्घ परम्परा भोजपुरी व अवधी में मौजूद है .ये सारे गीत संसार की असारता व अनाशक्ति के भाव को न केवल बताते हैं बल्कि हमें निर्वेद की स्थिति में पहुँचा देते हैं,ये गीत हमें संसार की वास्तविकता से परिचित कराते हैं.कबीर आदि संतो ने जीवात्मा को स्त्री व परमात्मा को ब्रम्ह रूप में वर्णित किया है,जो हर गीत में नज़र आता है,इसीलिए सुनने में ये गीत साधारण लग सकते हैं पर इन का अर्थ बहुत व्यापक व घुमावदार है.
मृत्यु पर कोई बात नहीं करना चाहता है ना ही ये गीत का विषय है किंतु निर्गुण गीत हमें मौत और उस के बाद का भाव भी समझा देते है.कर्मों का फल प्रारब्ध की जटिलता व जीवन की अन्य कड़वी सच्चाइयों को ये लोक गीत सरलता से आप तक पहुँचा देते हैं.इक वाक्य में कहें तो पूरी ज़िंदगी का फ़लसफ़ा निर्गुण गीत लोक विधा द्वारा हमें समझा देते हैं.ये गीत आज भी गाँवों-चौपालो में गाये व सुने जाते हैं,इन्हें स्त्री व पुरुष दोनों गाते है,ये निर्गुण गीत अपनी विशेष पहचान आज भी रखते हैं और हम आप थोड़ा सा प्रयास करें तो भविष्य में भी अपना स्थान बनाए रखेंगे,इसी मंगल भावना के साथ कुछ निर्गुण गीत आप के लिए प्रस्तुत हैं.
“डोलिया कंहार”
डोलिया कंहार ले के अईले सजनवा...२
अईले सजनवा हो मोरे माँगे लें गवनवा
डोलिया कंहार.....२
डोलिया में हमके दिहैं बैठाई
सुबुकी सुबुकी रोईहैं माई बाप भाई
डोलिया में हमरा के....२
छूटी जाईं हमरे,छूटी जाईं हमरे
बाबुल के अंगनवा
सजनवा हो मोरे माँगे लें गवनवा...२
पंचरंग चुनरी न पहिने गुजरिया
कहेल साजन ओढ़ कोरी चुनरिया....२
लेइ चल थाती जवन कईलू जतनवा
सजनवा हो मोरे माँगे लें गवनवा...२
सब केहु कुछ दूर देई पहुँचाई
लमहर राह में न केहु संग जाईं...२
इहे हवे जाने,इहे हवे रीत जाने
सगरो जहनवा
सजनवा हो मोरे माँगे लें गवनवा...२
जब देखिहै सैंया मोर सोलहो सिंगरवा
हमरा से प्रीत करीहैं दीहैं आदरवा....२
धन्य हो ज़ाईब,धन्य हो ज़ाईब हम
जुड़ा जाईं मनवा
सजनवा हो मोरे माँगे लें गवनवा....२
सोलह संस्कार दीप सोलहो सिंगरवा
पंचरंग चुनरी हो जैसे बा पियरवा....२
छिति जल पावक,छिति जल पावक
गगन पवनवा
सजनवा हो मोरे माँगे लें गवनवा...२
डोलिया कंहार ले के अईले सजनवा
सजनवा हो मोरे माँगे लें गवनवा .

“रोवे ले गुजरिया”
बैठल रोवे ले गुजरिया हो
चुनरिया में दाग़ लग गईल....३
कैसे जाईं पिया के नगरियाँ हो
चुनरिया में....२
बैठल रोवे ले गुजरिया हो
चुनरिया में दाग़ लग गईल...३
आईल बा गवना के
हमरो सनेसवा......२
जाये के बा हमरा के पिया
के देसवा.........२
काच बाटें हमरी उमरिया हो
काच बाटें........२
चुनरिया में दाग़..२
बैठल रोवे ले गुजरिया हो
चुनरिया में दाग़ लग गईल...२
नईहर में चार यार बनवली
दिन रात उनहीं से नैना लड़वली...२
उनके सूतवली हम सेजरिया हो
उनके सूतवली...२
चुनरिया में दाग...२
बैठल रोवे ले गुजरिया हो
चुनरिया में दाग़ लग गईल...२
चार बात सजना के
हम भूल गईली
पछतात बानी की इ का कईलीं...२
डोली आवत हमरो दुआरवा हो..
चुनरिया में दाग़....२
बैठल रोवे ले गुजरिया हो
चुनरिया में दाग़ लग गईल...२
चुनरी के दाग़ रामा
कैसे छोड़ाइब
कैसे हम सजना के
मुँहवाँ देखाइब....२
बरसे ला अँखिया के बदरिया हो
चुनरिया में दाग़...२
बैठल रोवे ले गुजरिया हो
चुनरिया में दाग़ लग गईल
कैसे जाईं पिया के नगरियाँ हो
चुनरिया में दाग़ लग गईल..२

“झुलनि”
झुलनि का रंग साँचा हमार पिया
ओहि झुलनि गोरी लागा हमार जिया
झुलनि...२
ओहि....२
कौन सुनरवा बनायों रे झूलनिया
रंग पड़े नहीं काचा हमार पिया
सुघड़ सुनरवा बनायो रे झूलनिया
दई अग्नि के आँचा हमार जिया
झुलनि के रंग साँचा हमार पिया
ओहि झुलनि गोरी लागा हमार जिया
छिति जल पावक गगन समीरा
तत्व मिलाई दियो पाँचा हमार पिया
पंच रतन से बनी रे झुलिनिया
जोई पहिरा सोई नाचा हमार जिया
झुलनि के रंग साँचा हमार पिया
ओहि झुलनि गोरी लागा हमार जिया
जतन से रखीयो गोरी झुलिनिया
गूँजे चहु दिसि साँचा हमार पिया
टूटी झुलिनिया फिर नाहीं बनिहे
फिर ना मिले ऐसा ढाँचा हमार पिया
झुलनि के रंग साँचा हमार पिया
ओहि झुलनि गोरी लागा हमार जिया
सुर नर मुनि देखी रीझें झूलनिया
कोई ना जग में बाचा हमार पिया
ऐही झुलनि का सकल जग मोहे
इतना मोहें साईं राँचा हमार पिया
झुलनि के रंग साँचा हमार पिया
ओहि झुलनि गोरी लागा हमार जिया.
“गौना नियराना”
करीं हम कौन बहाना
गौना मोरा अब नियराना...३
सब सखियन में मैली चादर
दूजे पिया घर जाना
तीजे डर मोहे सास ननद से
चौथे पिया जी से ताना
गौना मोरा...२
करी हम कौन बहाना
गौना मोरा अब नियराना...२
प्रेम नगर के राह कठिन है
वहाँ रंगरेज पुराना
ऐसी रंग रंगो मोरी चुनरी
ताकि पिया पहिचाना
गौना मोरा...२
करीं अब कौन बहाना
गौना मोरा अब नियराना...२
राह चलत मोहे जब वो
मिली गये
वा के नाम बखाना
कृपा भयी जब मोहे उनकी
तब से लगिहे ठिकाना
गौना मोरा...२
करीं अब कौन बहाना
गौना मोरा अब नियराना .
Wednesday, 24 July 2019
“सावन और कज़री”
एक बार फिर सावन अपनी सारी ख़ूबसूरती के साथ हमारे जीवन में प्रवेश कर चुका है.रिमझिम फुहारों से तन-मन प्रफ़्फ़ुलित है,ताल तलैया अपने यौवन पर हैं धरती ने एक बार फिर धानी चुनरिया ओढ़ ली है.वैसे तो सावन अपनी बहुत सी ख़ूबियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण मास माना जाता है,पर स्त्रियों के लिए व लोक परम्परा में तो इस का ख़ास स्थान है,पहले ज़माने में विवाहित स्त्रियाँ इस माह में मायके जाती थी और मायके जाना ही इक उत्सव होता था.हरे-भरे पेड़ों पे झूले पड़ जाते थे,कहीं कुछ सखियाँ मेहंदी के पत्ते तोड़ कर पीसने लग जाती थीं तो कहीं कोई महावर का घोल लिए बैठी होती थी,मेहंदी और महावर के नित नए नमूने से एक दूसरे को सजाने की होड़ लगी रहती थी,फिर बारी आती थी संगीत की तो जैसा आप सब जानते ही हैं इस माह में कज़री,झूला गाने की बहुत पुरानी परम्परा है.कज़री व झूला प्रायः स्त्रियों द्वारा ही ढोलक व मजीरे के साथ गाया जाता है,वैसे तो समूह में बैठ कर ही लोग इस का आनंद लेते हैं पर झूला झूलते समय भी ये गीत गाये जाते हैं.बड़ा सा झूला पड़ता था कई लोग इक साथ झूलते थे,कुछ बीच में बैठते थे और दो लोग दोनों छोरों से पींगे लगाती थी और झूला ,कज़री की स्वर लहरियों के साथ आसमान से बातें करने लगता था.इस तरह कज़री से ग्रामीण परिवेश का इक जीवंत रूप देखने को मिलता था.कज़री,आसाढ,सावन,भादो से लेकर क़्वार महीने तक पूरे ज़ोर शोर से गयी जाती थी.कज़री की इक विशेषता ये भी है की लोक रंग में होने के बावजूद भी ये क़व्वाली की तरह “सवाली-जवाबी” तरीक़े से भी गायी जाती है.U.P.के मिर्ज़ापुर की कज़री तो विश्व विख्यात है.लोक विधा में होने के साथ ही कज़री शास्त्रीय संगीत गाने वाले बड़े उस्तादों द्वारा भी बड़े शौक़ व मान से गायी जाती है.
ये सारी बातें आप लोगों को किताबी या ख़याली लगती होंगी,पर ऐसा नहीं है मैंने स्वयं ये सब देखा व इसका आनंद लिया है मुझे अच्छी तरह याद है मैं अपने ननिहाल जाती थी और वहाँ ये सब परम्परायें देखती थी.मानती हूँ कि अब ये सब छूटता जा रहा है इस तेज़ रफ़्तार दुनिया में किसी को समय ही नहीं है की वो मेहंदी,महावर का श्रिंग़ार करे व कज़री और झूला का आनंद ले,पर अभी भी कुछ लोग हैं जो अपनी परम्परा व धरोहर को बचाना चाहते हैं,मेरा blog #sanjha bhor,बस इस ओर इक छोटा सा प्रयास है.इसीलिए मैं समय-समय पर आप तक वो लोक गीत पहुचाने का प्रयास करती रहती हूँ.अब वो पहले वाली बात तो रही नहीं पर ये देख कर मन को थोड़ी तसल्ली होती है की आज के आधुनिक समाज में,जहाँ ladies की किटी party और club का culture है वह भी सावन आते ही लोगों में उत्साह भर जाता है और लोग भले ही इक दिन के लिए करें लेकिन सावन का स्वागत होता है,स्वरूप बिलकुल बदल गया है लेकिन परम्परा जीवित है इस का संतोष होता है.अब तो लगभग हर club में लोगों में तरह-तरह के compitiom होते हैं teej queen चुनी जाती हैं,टेंट हाउस से मँग़ा के झूला भी पड़ जाता है और यदि किसी को आता है तो इक आध कज़री भी हो जाती है अन्यथा DJ तो है ही,और इस तरह सावन मन जाता है.
मेरा विश्वाश है कि आगे बढ़िये किंतु अपनी परंपराओं के साथ,अपनी जड़ों से जुड़े रह कर आधुनिक बनें,समाज ज़्यादा ख़ूबसूरत बनेगा,अपने बच्चों को यदि हम ये सिखा पायें की उन की दादी,नानी क्या करती थी तो वो,प्राचीन-नवीन के मिलन की सर्वथा मौलिक अनुकृति बनेगें.
कुछ कज़री व झूला गीतों को फिर आप के बीच रख रही हूँ इस आशा के साथ की आप को पसंद आयेंगे.आप सभी को सावन की बहुत-बहुत शुभकामनायें .

#अमीर-खुसरो का सावन गीत”
अम्माँ मेरे बाबा को भेजो री
की सावन आया री
अम्माँ मेरे....२
बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री
अरे बेटी तेरा....२
की सावन आया री...२
अम्माँ मेरे...२
की सावन आया री...२
अम्मा मेरे भैया को भेजो री
की सावन आया री..२
बेटी तेरा भैया तो छोटा री
अरे बेटी...२
की सावन आया री..२
अम्माँ मेरे बाबा को भेजो री
की सावन आया री
अम्माँ मेरे....२
अम्माँ मेरे मामा को भेजो री
की सावन आया री...२
बेटी तेरा मामा परदेसी री
अरे बेटी...२
की सावन आया री...२
अम्माँ मेरे बाबा को भेजो री
की सावन आया री.

“झिर झिर बुनिया”
घिर घिर आए बदरा ..
पडेला झिर झिर बुनिया
पडेला झिर झिर बुनिया...२
के रे लावे रेशम डोरी
के रे चंदन पटरी
पडेला झिर झिर बुनिया..२
अरे राधा लावे रेशम डोरी
रेशम डोरी हो रेशम डोरी
किशन लावे चंदन पटरी
पडेला झिर झिर बुनिया...२
अरे के रे झूले के रे झूलावे
के रे गावे ला कजरिया...२
पडेला झिर झिर बुनिया
अरे राधा झूलें,किशन
झुलावें..२
किशन झूलावें रे किशन
झूलावें...२
सखियाँ गावें ली
कजरिया...२
पडेला झिर झिर बुनिया..२
घिर घिर आए बदरा...
पडेला झिर झिर बुनिया.

“सवनवा में नहीं जाइब”
अरे चाहे भैया रूठे चाहे जायें
सवनवा में नहीं जाइब नन्दी
अरे चाहे....२
सोने के थरिया में जेवना परोसों
जेवना परोसों हाँ जेवना परोसों
चाहे भैया जीमे चाहे जायें
सवनवा में नहीं ज़ाईब नन्दी..२
चाहे भैया रूठे चाहे जायें
सवनवा में नहीं ज़ाईब नन्दी
चाहे भैया...२
मगही पतईया के बीड़ा लगायों
बीड़ा लगायों हाँ बीड़ा लगायों
चाहे भैया राचे चाहे जायें
सवनवा में नहीं ज़ाईब नन्दी...२
चाहे भैया रूठे चाहे जायें
सवनवा में नहीं ज़ाईब नन्दी
चाहे भैया...२
चुन चुन कलियों से सेज बिछायो
सेज बिछायो हाँ सेज बिछायो
चाहे भैया सोवें चाहे जाए
सवनवा में नहीं ज़ाईब नन्दी..२
चाहे भैया रूठे चाहे जायें
सवनवा में नहीं ज़ाईब नन्दी.

“घटा घनघोर”
अरी बहना उठी है घटा घनघोर
चमकी है बिजली ज़ोर से....२
अम्बर लरजे बादल गरजें...२
अरे रामा मोर मचाए शोर
चमकी है बिजली...२
अरे बहना उठी घटा घनघोर
चमकी है बिजली ज़ोर से...२
कौन के भीगे चुनरी
कौन के भीगे वेणी..२
चमकी है बिजली..२
चंपा कली के भीगे चुनरी
राधा के भीगे वेणी
बहना चमकी है बिजली..२
अरे बहना उठी घटा घनघोर
चमकी है बिजली...२
कौन के भावे मेहंदी महावर
कौन के भावे झूला..२
चमकी है बिजली..२
चंपा कली के भावे महावर
राधा रानी के झूला...२
चमकी है बिजली...२
अरे बहना उठी घटा घनघोर
चमकी है बिजली ज़ोर से.

“बदरिया”
घेरी घेरी आयी सावन
की बदरिया ना...२
हो बदरिया ना हो बदरिया ना
घेरी घेरी....२
पानी बरसे बड़ी ज़ोर
सूझे नाहीं चारों ओर...२
जिया काँपे मोरा
चमके ला बिज़ूरिया ना
हो बिज़ूरिया ना हो बिज़ूरिया ना..२
घेरी घेरी आयी सावन
की बदरिया ना..२
एक तो सावन के अंधेर
ओ पे बदरा घेर घेर...२
डर लागे
मोरी सूनी बा अटरिया ना
हो अटरिया ना हो अटरिया ना...२
घेरी घेरी आयी सावन
की बदरिया ना...२
जब से पिया परदेस
पतिया एको नहीं आए
मोहे याद आए बिसरे
साँवरिया ना...२
हो साँवरिया ना हो
सवाँरिया ना..२
घेरी घेरी आयी सावन
की बदरिया ना...२
बदरिया ना हो बदरिया ना.
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