Wednesday, 20 September 2017

निमिया पतैया झरी जाए


"स्वछाग्रही" ,सत्याग्रही के बाद ये शब्द नए चलन में आया है.मित्रों,हमारे देश,समाज,में सफ़ाई का ना तो चलन नया है ना ही सफ़ाई रखने में कोई कोताही की जाती है,हाँ स्वच्छाग्रही शब्द ज़रूर नया है. जो स्पष्ट रूप से सफ़ाई अभियान में कार्य करने वालों के लिए प्रयोग किया जाता है. 
माननीय प्रधान मंत्री जी भी सफ़ाई अभियान को काफ़ी महत्व देते है,कई योजनायें चलती रहती है.जो की इक बहुत अच्छा प्रयास है. क्यूँ की मेरे पति इक प्रशासनिक अधिकारी है तो बहुत क़रीब से मुझे भी ऐसे कई कार्यक्रम देखने को मिलते है. कभी रैली, कभी सभा तो कभी कोई अन्य कार्यक्रम. पर इनसे होता क्या है? लोग सफ़ाई से ज़्यादा अपनी सेल्फ़ी लेने में लगे रहते है.सबको लगता है की अगले दिन अख़बार में झाड़ू के साथ मेरी फ़ोटो छप जाए,और कार्यक्रम को सफल मान लिया जाये.जैसे इक फ़ैशन सा बन गया है की सफ़ाई अभियान से जुड़ जाओ.चाहे वो कोई N.G.O. हो या सरकारी अभियान या वालंटियर्स. 
कुछ लोग वास्तव में अच्छा काम कर रहे हैं तो कुछ 'सेल्फ़ी' से ही ख़ुश हैं.

                   
जन्म लेने के साथ ही हमें घर,स्कूल हर जगह सफ़ाई का महत्व समझाया जाता है,किंतु प्रश्न ये है की हम समझते कितना है.देखा जाए तो हर आदमी अपनी स्वच्छता तो पूरी करता है लेकिन ये सजगता सिर्फ़ अपने तक ही सीमित रहती है. अपना शरीर,अपना घर साफ़ और अच्छा दिखे क्या इतना ही काफ़ी है?...नहीं,पर करते हम ऐसा ही है.

हम क्यूँ अपने से आगे की बात नहीं सोचते हैं? अपनी सफ़ाई,अपना घर,इससे बाहर निकलना होगा और अपने आस पास की जगह, कार्यस्थल,पार्क,सड़क इस तरह की सभी सार्वजनिक स्थलों के प्रति हमें सोचना होगा. 

देखिए लोक संगीत कैसे सदियों से सफ़ाई का पाठ पढ़ाता आ रहा है. आमतौर पर स्वच्छता पे दिया जाने वाला  जो ज्ञान उपदेशात्मक लगता है यानी की 'boring' गाने हँसी ठिठोलि में बता जाते हैं. मिसाल के तौर पर अपने दो पसंदीदा भोजपुरी गीतों को पेश कर रही हूँ. 
तो सफ़ाई  करते करते मनोरंजन का भी रस लीजिए.



पहला गीत दादरा धुन पे रचा गया है:

निमिया पतैया झरी जाए हो, अगनवा बहारू क़यिसे
अगनवा बहारू क़यिसे
अगनवा बहारू कयिसे,                                
 निमिया पतैया झरी जाए हो,अगनवा बहारू क़यिसे

ओहि रे नगरियाँ ससुर जी के डेरा,
ससुर जी के.
पगड़ी देखत जिया जाए रे,अगनवा बहारू कयिसे.
निमिया पतैया झरी जाए हो,अगनवा बहारू क़यिसे.
अगनवा बहारू.

ओहि रे नगरियाँ जेठ जी के डेरा,
जेठ जी के डेरा.
तनिको छुवत जिया जाए हो,अगनवा बहारू कयिसे.
निमिया पतैया झरी जाए हो,अगनवा बहारू क़यिसे.
अगनवा बहारू.

ओहि रे नगरियाँ देवर जी के डेरा,
देवर जी के डेरा.
अँखियाँ लड़त जिया जाए हो,अगनवा बहारू क़यिसे.
निमिया पतैया झरी जाए हो,अगनवा बहारू कयिसे.
अगनवा बहारू.

निमिया पतैया झरी जाए हो,अगनवा बहारू क़यिसे.
अगनवा बहारू कयिसे.

दूसरा गीत कहरवा ताल पर है. यह एक बहुत पारम्परिक गीत है. ख़ास तौर पे पूर्वी उत्तर प्रदेश में गया जाने वाला यह गाना थेठ भोजपुरी में है. हो सकता है कुछ शब्दों का अर्थ आपको समझ ना आए, उनके मतलब मैंने नीचे दिए हैं.



होत भिनसहरा सासु हमके जगावेली,
हमके जगावेली,
की उठु बहुवर ना,उठी के अँगना बहारू,
की उठु बहुवर ना,
होत भिनसहरा सासु हमके जगावेली,
हमले जगावेली.

अँगना बहरली दुवरवा घुरवा डरली,
दुवरवा घुरवा डरली,
अँगना बहरली.
की ताके लागी ना,की ताके लागी ना,
परदेसिया के रहियाँ,की ताके लागी ना,
परदेसिया.

कौने ही रंगवा बाटें,तोहरे हो सजनवा,
तोहरे हो सजनवा,
कौने ही रंगवा बाटें, तोहरे हो सजनवा,
तोहरे हो सजनवा.
कवन रंगवा ना,कवन रंगवा ना,
बाँधे सिरवा के पगड़ियाँ,कवन रंगवा ना,

सँवरे ही रंगवा बाँटे,हमरे हो सजनवा,
हमरे हो सजनवा,सबुज रंगवा ना,
सबुज रंगवा ना,
बाँधे सिरवा के पगड़ियाँ सबुज रंगवा ना,
बाँधे सिरवा के.

होत भिनसहरा सासु हमके जगावेली,
हमके जगावेली.
की उठु बहुवर ना,उठी के अँगना बहारू,
की उठु बहुवर ना.

होत भिनसहरा सासु हमके बोलावेलि,
हमके बोलाबेली ,
की आउ बहुवर ना,की आउ बहुवर ना,
आये के सेजिया बीछाऊ,की आउ बहुवर ना,


सेजिया बिछौली,रूपवॉ सँवरली,
रूपवा सँवरली,की जोहे लागी ना,
की जोहे लागी ना,
परदेसिया के रहियाँ की जोहे लागी ना,

होत भिनसहरा सासु हमके जगावेली,
हमके जगावेली,हमके जगावेली,
की उठु बहुवर ना,
उठी के अँगना बहारू.


ये गीत बहु प्रचलित "कँहरवा" ताल पे रचित है.इस में प्रयुक्त कुछ शब्द बहुत कठिन हैं,इसलिए नीचे मैं कुछ शब्दों का अर्थ भी बता दे रही हूँ.

"भिनसहरा" अर्थ भोर का समय.
"दुवरवा"    अर्थ द्वार पर.
"घुरवा"      अर्थ कूडा/कचरा.
"सबुज"      अर्थ हरा रंग.

अँगूठी जड़ल मोर नगिनवा

मैं मध्यम वर्गीय परिवार से हूँ,लेकिन वर्ग कोई भी हो हमारे देश में,हमारे समाज में स्त्री का ज़ेवर गहने से लगाव सदियों से चला आ रहा है. शायद ही कोई स्त्री होगी जो ज़ेवर देख कर ललच ना जाती हो,और इस कमज़ोरी का फ़ायदा सुनार भी ख़ूब उठाते है. जैसे किसी को दुकान पे कुछ पसंद आ गया पर रक़म पूरी नहीं है तो ख़रीदूँ या ना ख़रीदूँ इस कश्मकश में सुनार की वो आवाज बहुत प्रिय लगती है की, "अरे ले जायिये पैसे कहीं भागे थोड़ी जा रहे है धीरे धीरे दे दीजियेगा", और इस तरह एक न एक ज़ेवर बन जाते है. ज़ेवर-गहने से स्त्री के लगाव के उदाहरण तो हर तरह से हर जगह देखने को मिलते है. 
मुझे बचपन में देखी movie-"साहब बीवी और ग़ुलाम" का एक दृश्य याद आता है,मीना कुमारी को रहमान कहते हैं "तुम्हें परेशानी क्या है, जितने चाहो रोज गहने तुड़वाओ और बनवाओ". मतलब उसका जीवन ही यही तक सीमित कर देते हैं. ऐसे तो अनेक उदाहरण हैं जिनका ज़िक्र फ़िलहाल तो सम्भव भी नहीं,ये सब बताने का मतलब सिर्फ़ इतना था की औरत और ज़ेवर को अलग करना लगभग असंभव सा ही है. 

तो भैया, लोक गीत क्यूँ पीछे रहें, इन गीतों में भी ज़ेवर-गहने का ज़िक्र अनगिनत बार होता रहता है. इसी लिए हमारी बेचारी नायिका एक नगीना खो जाने पर इतनी परेशान है. देवी-देवताओं से भी विनती कर रही है की उसकी अँगूठी मिल जाये.

लोक गीत में हमारे समाज का ही प्रतिबिम्ब दिखता है. थोड़ा सा शृंगार रस का प्रयोग गीत को रोचक बना देता है .


अँगूठी जड़ल मोर नगिनवा,
नगिनवा मोर हेराई गईलें सजना.
अँगूठी.

अँगना में खोजलि,ओसरवा में खोजलि,
खोज अयली सारा मैदनवा,
नगिनवा मोर.
अंग़ूठी.

सास मोरी मरिहैं,ननद गरीयहाएँ,
लहुरा देवरवा बोले बोलियाँ,
नगिनवा मोर.
अंग़ूठी.

लौंग कपूर मनलि,देवी माई थनवा,
मानी अयिली,गोरख नाथ बाबा,
नगिनवा मोर.
अंग़ूठी.

नाहीं तू रोव धाना,नाहीं तू कलपा,
सेजिया पे गिरल तोर नगिवना,
नगिनवा तोर मिली गईले सजनी.

अंग़ूठी जड़ल मोर नगिवना,
नगिनवा मोर मिली गईले सजना.



Tuesday, 19 September 2017

सैयाँ मिले लरिकैयाँ


"बाल विवाह "
"बेमेल विवाह"
"स्त्री का पुरुष की अपेक्षा जल्दी वयस्क होना"
         ये गीत आप के सामने इक दृश्य प्रस्तुत करता है.जिसने नायिका अपनी सखियों से अपने मन की बात कहती है,की कैसे वो बार बार अपने प्रिय को रिझाने का प्रयास करती है पर वो उसकी बात नहीं समझता है,और अपनी बचकानी हरकतें करता रहता है.
                साथ ही गीत में तत्कालीन समाज में प्रचलित ग़लत रीति-रिवाजों पर भी कटाक्ष है.तब "fb"Twitter"और "whatsapp" तो था नही,तो यूँ ही अपने मन की बात उलाहने के तौर पर गीत में सबके बीच कह दी जाती थी.


"बारी उमरिया ब्याह के आयी,
मैं भोली सैयाँ नादान..........
कैसी बिपत पड़ी मोरी गुइयाँ,
कछु ना बूझे अजान............"

सैयाँ मिले लरिकैयाँ मैं का करूँ,
हाय हाय का करूँ.
सैयाँ मिले.

बारह बरस की मैं,ब्याह के आयी,
बारह बरस सखी बारह बरस ,
बारह बरस की मैं,ब्याह के आयी,
सैयाँ उड़ाएँ कनकैयाँ,मैं का करूँ,
सैयाँ मिले.
हाय हाय.

चौदह बरस की मैं,होने को आयी,
चौदह बरस गुइयाँ, चौदह बरस,
चौदह बरस की मैं होने को आयी,
सैयाँ चलें पैयाँ पैयाँ,मैं का करूँ,
सैयाँ मिले.
हाय हाय.

सोलह बरस की मैं,गौने पे आयी,
सोलह बरस गुइयाँ,सोलह बरस,
सोलह बरस की मैं होने को आयी,
सैयाँ करे मैया मैया,मैं का करूँ,
सैयाँ मिले.
हाय हाय.

अठरा बरस की मैं होने को आयी,
अठरा बरस,गुइयाँ अठरा बरस,
अठरा बरस की मैं होने को आयी,
सैंया छुड़ाएँ कलाईयाँ,मैं का करूँ,
सैयाँ मिले.
हाय हाय.
सैयाँ मिले लरीकैया,मैं का करूँ.


अरे हम से बलम की ऐसी बिगड़ी


जहाँ प्यार है,मनुहार है,शृंगार है,वही पर थोड़ी  मीठी तकरार भी है.ये गीत नायक नायिका के उसी सुंदर झगड़े का बयान करता है.
         साथ ही साथ गीत स्त्री सुलभ ईर्ष्या भी बताती है. ये उसके मन का डर ही है जो उसे लगता है की यदि पुरुष उससे ख़ुश नहीं है तो निश्चय ही किसी और स्त्री के पास मन बहलाने चला जाता होगा.वो बेचारी अपनी अनदेखी सौत को मन ही मन कोसती रहती है.मन में असुरक्षा का भाव बहुत रोचक है.




अरे हम से बलम की ऐसी बिगड़ी,
ऐसी बिगड़ी,
हमरी कतरी सुपारी ना खायें,
हाय हाय,हमरी कतरी सुपारी ना खायें,
अरे हम से बलम.

सोने की थरिया में ज़्योना परोसा,
अरे हम से बलम की ऐसी बिगड़ी,
ऐसी बिगड़ी,
वो तो खावे सवत घर जायें,
अरे हम से बलम.
हाय हमरी कतरी सुपारी ना खायें,
अरे हम से बलम.

बेला चमेली का सेज बिछाया,
अरे हमसे बलम की ऐसी बिगड़ी,
ऐसी बिगड़ी,
वो तो सोवे सवत घर जाए,
अरे हम से बलम.
हाय हमरी कतरी सुपारी ना खायें,
अरे हम से बलम.

लौंग इलाइची का बीड़ा लगाया,
अरे हम से बलम की ऐसी बिगड़ी,
ऐसी बिगड़ी,
वो तो रचेबे सवत घर जायें,
अरे हम से बलम की ऐसी बिगड़ी,
ऐसी बिगड़ी,
हाय हमरी कतरी सुपारी ना खायें,
अरे हम से बलम की ऐसी बिगड़ी,
ऐसी बिगड़ी,

वो तो पीवें,घर महकाय,
वो तो रचेबे सवत घर जायें,
वो तो सोवे सवत घर जाए,
वो तो खावे सवत घर जायें,

अरे हम से बलम की ऐसी बिगड़ी,
ऐसी बिगड़ी,
हाय हमरी कतरी सुपारी ना खायें,
अरे हम से बलम की ऐसी बिगड़ी,



Monday, 18 September 2017

मैं ज़ालिम चोर बजनी बिछिया लायी



"थोड़ा धीरे हँसा करो.
  दबे पाँव चलो.
 अरे घूँघट तो ले लो." 
हर दिन ऐसी बातें सुनने वाली लड़की जब ढोलक ले के गाना गाने बैठती है तो मन की पूरी भड़ास निकालने का ठान के बैठती है. लोक गीत उसे कुछ पलों के लिए अपनी वास्तविक चंचलता दिखाने का अवसर देते हैं. जो वो छोटी सी उम्र में बहु का लबादा ओढ़े नहीं कह पाती, शायद ऐसे गीतों से व्यंग के रूप में कह जाती है.

ये सामान्य रूप से "दादरा" ताल पे आधारित एक लोक गीत है.जिसमें नायक नायिका के हास -परिहास का वर्णन है.



मैं ज़ालिम चोर बजनी बिछिया लायी,
मैं ज़ालिम चोर.

अरे राजा कहें,गोरी अकेले में आना,
अरे राजा.
मैं ज़ालिम चोर.
मैं ज़ालिम चोर नन्दि ले के आयी,
मैं ज़ालिम चोर.

अरे राजा कहें,गोरी अन्धेरे में आना,
अरे राजा.
मैं ज़ालिम चोर.
मैं ज़ालिम चोर,दियना ले के आयी,
मैं ज़ालिम चोर.

अरे राजा कहे,गोरी चुपके से आना,
अरे राजा.
मैं ज़ालिम चोर.
मैं ज़ालिम चोर,ठुमका दई के आयी,
मैं ज़ालिम चोर,बजनी बिछिया लायी.

Listen to this song here:https://www.youtube.com/watch?v=Rc57Osz3-54

Friday, 15 September 2017

रेलिया बैरन पिया को लिये जाए रे।

रेल भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। मिलने बिछड़ने का शायद ही कोई क़िस्सा रेल के बिना पूरा होता है। अशोक कुमार का "रेल गाड़ी रेल गाड़ी" हो, राजेश खन्ना का "मेरे सपनों की रानी" या ट्रेन पकड़ने को प्लाट्फ़ोर्म पर दौड़ती सिमरन , हिंदी फ़िल्म जगत ने रेल को कई रूप दिए हैं
रोचक बात है की इस श्रेणी में लोक गीत भी पीछे नहीं हैं। आज जब देश में बुलिट ट्रेन की शुरुआत हो रही है, आइए याद करते हैं भोजपुरी के इस्स लोकप्रिय गीत को जिसमें हमारी नायिका रेल को ही अपना दुश्मन मान बैठी है क्यूँकि वह उसके पति को उससे दूर ले जा रही है.  



इस गीत में विरह भाव तो है ही,साथ ही रेल का हमारे पुराने समय समाज से कितना गहरा जुड़ाव है,ये भी दर्शाता है.


रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे,
रेलिया बैरन.

जौने टिकटवा से पिया मोरे ज़ईहें,
पिया मोरे ज़ईहें हो पिया मोरे ज़ईहें
बरसे पनिया.
बरसे पनिया टिकट गली जाए हो,
रेलिया बैरन.  

जौने शहरवा में पिया मोरे ज़ईहें,
पिया मोरे ज़ईहें हो पिया मोरे ज़ईहें
लगी जाए अगिया.
लगी जाए अगिया शहर ज़री जाए हो,
रेलिया बैरन.

जौने मलिकवा के पिया मोरे नौकर,
पिया मोरे नौकर हो पिया मोरे नौकर
पड़ी जाए छापा.
पड़ी जाए छापा पुलिस लई जाए हो,
रेलिया बैरन.

जौने सवतिया के पिया मोरे आशिक़,
पिया मोरे आशिक़ हो पिया मोरे आशिक़,
गिर जाए बिजुरी.
गिर जाए बिजुरी सवति मरी जाए हो,

रेलिया बैरन.

Listen to this song here: 
https://m.youtube.com/watch?v=IOr9fMygrLg