Sunday, 28 January 2018

MELA aur MASTI !



कुछ ऐसी यादें या बातें आप को याद रह जाती है जिन से आप को लगाव होता है.मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ जब मैं famous folk singer मालिनी अवस्थी जी से मिली,मैं इसे अपना सौभाग्य मानती हूँ की इटावा महोत्सव के माध्यम से जिन्हें मैं अपना गुरु मानती हूँ उनसे मिल पायी और अच्छा समय बिताया.वो समय हमेशा मेरे स्मृति में संचित रहेगा.


      
 मालिनी जी के द्वारा गाये कुछ गीत मैं आप तक पहुँचा रही हूँ.

पुराने ज़माने में कम उम्र में शादी होना आम बात थी. कई बार तो बच्चों को पता भी नहीं होता था की उनके साथ क्या हो गया माता पिता ही आपस में मिल बैठ कर रिश्ता तय कर विवाह कर देते थे.
समय के साथ जब बच्चे बड़े होते थे तो उनकी मन में तरह तरह के विचार आते थे....एक दूसरे की भावनाओं को समझने का प्रयास करते थे और ऐसे ही प्रयासों में कुछ लोक गीतों का जन्म हो जाता था ऐसा ही इक गीत है जो मालिनी जी ने इटावा महोत्सव के मंच पर गाया और लोगों ने बहुत आनंद लिया.गीत में भाव है की नायिका बार बार अपने पति के बचकाने व्यवहार पर परेशान हो जाती है और अपनी शिकायत गीत में दिखाती है.


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"छोटे से बलम" 

छोटे से नन्हें से हमका मिले रे बालम,
की छोटे से.
बालम छोटे से.
छोटे से नन्हें से.

जब मैं गयी हलवैया दुकनिया
जब मैं,
मिल गए बालम छोटे से,
अरे वही मचलें वही रोयें
लड्डो दिला दो मेरी जान,
की बालम छोटे से.
छोटे से नन्हें से.

जब मैं गयी बजजवा दुकनिया,
मिल गए बालम छोटे से,
अरे वही मचलें वही रोए 
कुर्ता सिला दो मेरी जान,
की बालम छोटे से.
छोटे से नन्हें से.

जब मैं गयी पनवड़िया दुकनिया,
मिल गए बालम छोटे से,
अरे वही मचलें वही रोयें
बीड़ा खिला दो मेरी जान,
की बालम छोटे से.
छोटे से नन्हें से.



मौसम में हल्की ठंड,सज हुआ मंच,दर्शकों की भीड़ और मालिनी जी का गाया इक और लोक गीत,सबके मन को छू गया.मालिनी जी की विशेषता ये है की वो अपने गीतों का चयन,दर्शकों व स्थान के आधार पर करती हैं.यहाँ मैंने ध्यान दिया की वो ठेठ भोझपूरी ना गा कर कुछ अवधी व ब्रज का मधुर राग छेड़ रही थी जिससे सभी झूम जा रहे थे.
वैसे तो ये गीत होली का है पर यहाँ लोक गीत के रूप में गाया गया.
गाने में कृष्ण के साथ गोपियों का परिहास चल रहा है,क्यूँकि इटावा ब्रज भूमि में ही आता है तो लोग बहुत मगन हो कर ऐसे गाने सुनते है.हमारे समाज में तो लोग ईश्वर को भी बाँट लेते है,अयोध्या से और पूरब जाइए तो श्री राम आप के भगवान हैं और इधर ब्रज भूमि आते ही लोग कृष्ण भक्त हो जाते है .चलिए आप तो गीत का आनंद लीजिये.

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"रसिया को नार "

रसिया को नार बनाओ री,
रसिया को 
रसिया को नार बनाओ री,
रसिया को .

बेन्दी भाल नयन बिच काजल,
नयन बिच काजल,
नयन बिच काजल .
नकबेसर पहनावो री,
रसिया को,
रसिया को नार बनाओ री,
रसिया को.

कटी लहंगा और माही कंचकि,
कटी लहंगा और माही,
माही कंचकि हो माही कंचकि,
कटी लहंगा और माही कंचकि,
चुनर सर पे ओढ़ाओ री रसिया को.
रसिया को नार बनाओ री,
रसिया को.


कान्हा जब मोरी बात ना माने,
कान्हा जब .
बात ना माने कान्हा बात ना माने,
यमुना तट पे ख़ूब नचाओ री,
रसिया को,
रसिया को नार बनाओ री,
रसिया को.


सावन का महीना आते ही जैसे सब कुछ बदल सा जाता है जैसे, मौसम, मन  और भावनायें,विवाहित स्त्रियाँ मायक़े जाने की आस लगाए बैठी रहती थी. मन में चाह होती थी की, काश,माँ के घर से बुलावा आ जाये . कुछ दिन तो घर परिवार की ज़िम्मेदारियो से मुक्त हो कर वापस अपना बचपन, पेड़ों पर झूले, पुरानी सखियोंके साथ कजरी और माँ की गोद का आनंद ले सकें. कुछ ऐसे ही भावों को दर्शाता है ये गीत .


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"सावन आया"


अम्माँ मेरे बाबा को भेजो री,
की सावन आया, की सावन .
अम्माँ मेरे .
की सावन आया री.

बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री,
की सावन आया, की सावन.
अम्माँ मेरे बाबा को भेजो री,
की सावन आया.

अम्माँ मेरे भैया को भेजो री,
हो अम्माँ मेरे भैया को भेजो री,
अरी बेटी तेरा भैया तो बाला री,
बेटी तेरा भैया तो बाला री,
की सावन आया.

अम्माँ मेरे बाबा को भेजो री,
की सावन आया री.


बेटी का विवाह और बेटी की विदाई,
हमारी पुरानी परम्परा है.सदियों से ये होता आया है और आगे भी होता रहेगा, भले ही उसका रूप भाव बदल गया है,पुराने ज़माने में बेटी विदा हो कर जाती थी,तो जल्दी अपने मयके वापस नहीं आ पाती थी.जाते जाते जो भाव उसके मन में आते हैं,या पहले से ही कोई शिकायत थी, जो वो कह नहीं पायी घर छोड़ने की जो पीड़ा है वो "अमीर खुसरो " जी द्वारा लिखे गीत में जैसे जीवंत हो उठता है.
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"बाबुल"

काहे को ब्याहे विदेश 
अरे लखिया बाबुल मोहे ,
काहे को ब्याहे विदेश 


हम तो बाबुल तेरे बेले की कलियाँ ,
अरे घर घर मांगन जाए,
अरे लखिया बाबुल मोहे ,
काहे को ब्याहे विदेश .

महलन तले से डोला जो निकला,
अरे बीरन ने खायी पछाड़ 
अरे लखिया बाबुल मोहे,
काहे को ब्याहे विदेश.

भैया को दियो बाबुल ,
महला दूमहला,
अरे हमको दियो परदेस
अरे लखिया बाबुल मोहे,
काहे को ब्याहे विदेश 

अरे लखिया बाबुल मोहे,
काहे को ब्याहे विदेश 
अरे लखिया बाबुल मोहे,
काहे को ब्याहे विदेश .


Thursday, 9 November 2017

वैवाहिक गीत शृंखला

मौसम में हल्की हल्की ठंड है,आस्माँ में खिलता हुआ चाँद है और साथ ही आ गया है एक बार फिर शादी-ब्याह का मौसम. हमारे भारतीय समाज में शादी कितनी अनूठी होती है आप सब जानते हैं, अनगिनत रस्मों-रिवाज बहुत सी पुरानी प्रथाएँ ढेर सारी मस्ती, ढोल नगाड़े और बहुत सा नाच-गाना.
            पहले शादी की तारीख़ तय होते ही लगभग एक माह पहले से ही घर में गाने-बजाने का माहौल बन जाता था.
घर की बड़ी बुजुर्ग महिलायें तो शादी से सम्बंधित कोई भी काम गाने के बिना शुरू ही नहीं करती थी, चाहे वो चावल बीनना हो या, मिट्टी के चूल्हे बनाना,घर की सारी औरतें तो रहती ही थीं आस पड़ोस से भी लोगों को बुला लिया जाता था जो काम करवाने में भी हाथ बँटाती थी और गीत-संगीत में भी पूरे उत्साह से जुट जाती थीं. काम भी होता था और मनोरंजन भी. ये एक बहुत ही अनूठी और विशेष बात है की हमारे समाज में ही हर रस्म के लिए अलग-अलग गाने होते हैं. 

ज़माना अब बहुत बदल गया है, अभी हम लोगों को ही याद है की घर में शादी-ब्याह या कोई ख़ुशी का मौक़ा हो तो लोग घर में ही ढोलक की थाप और गुँघरु की छनक के साथ अपना सुर मिला कर पूरा घर ही गूंजा देते थे.दादी,नानी,मामी,चाची,बुआ सब आतुर रहते थे अपना गाना गाने के लिए,सबके पास ख़ज़ाना होता था और सब मिलकर घर गुलज़ार कर देती थीं.अब ना तो वो लोग है ना ही वो समय,बस D.J.लगवा लिया कानफाड़ू Bollywood के गाने बजा कर ही संतुष्ट हो लेते हैं.पर मैं चाहती हूँ की ये परम्परा जारी रहे चाहे थोड़ा ही समय निकाले और पारम्परिक लोकगीत गायें .

मैं पूरी कोशिश करूँगी की लगभग सभी रस्मों के गीत आप तक पहुँचा सकूँ. 
तो लीजिए इस वैवाहिक गीत शृंखला में कुछ पारम्परिक विवाह गीत, आनंद उठायें.



"विवाह गीत "

"साँवर दुल्हा"

तोहार दुल्हा हो, तोहार दुल्हा 
साँवर साँवर सूरतिया तोहार दुल्हा,
साँवर साँवर.
गोरे गोरे लखन, रंगदार दुल्हा,
हो तोहार दुल्हा,हो तोहार दुल्हा,
साँवर साँवर.

केहु हाथी चढल केहु घोड़ा चढल,
केहु ऊँट पर सवार बराती चलल
केहु हाथी.
धुन पालकी चढल हाँ, सुकुमार दुल्हा,
तोहार दुल्हा हो,
साँवर साँवर सूरतिया तोहार दुल्हा,
तोहार दुल्हा .

देखीं शोभा मढ़वा के, मनवा भरल
देखी शोभा .
हीरा मोती जड़ल, इनरासन बनल,
हीरा मोती.
धुन बरसेला बन के, फुहार दुल्हा,
तोहार दुल्हा.
साँवर साँवर सूरतिया तोहार दुल्हा,
तोहार दुल्हा.

गोरे गोरे लखन, रंगदार दुल्हा,
साँवर साँवर सूरतिया तोहार दुल्हा,

राम सीता मिलन,सुन के चलल पवन,
राम सीता मिलन.
जब जुटल सनेहिया, तब रोके कवन,
कईसन जोड़ी जुडल, सरकार दुल्हा,
कईसन जोड़ी जुडल.
तोहार दुल्हा हो तोहार दुल्हा,
साँवर साँवर सूरतिया तोहार दुल्हा.

गोरे गोरे लखन,रंगदार दुल्हा,
साँवर साँवर सूरतिया तोहार दुल्हा.



"झिर झिर बुनिया"

झिर झिर बुनिया हो,झिर झिर बुनिया,
कंहवा से पडेला,कंहवा से पडेला,
सिया दुल्हनियाँ, पडेला झिर झिर बुनिया,
कंहवा से,कंहवा से सिया दुल्हनियाँ,
झिर झिर बुनिया हो.

कंहवा से आवत बाने राम धनुधारियाँ,
कंहवा से आवत.
कंहवा से,कंहवा से,सिया दुल्हनियाँ 
पडेला झिर झिर बुनिया,
अयोध्या से आवत बाने राम धनुधारियाँ,
अयोध्या से.
पडेला झिर झिर बुनिया 
कोहबर से,कोहबर से,सिया दुल्हनियाँ,
पडेला झिर झिर बुनिया ,
झिर झिर बुनिया हो,झिर झिर बुनिया.

रथवा चढल आवे राम धनुधारियाँ,
रथवा चढल आवे.
पडेला झिर झिर बुनिया ,
पालकी पर सिया दुल्हनियाँ
पडेला झिर झिर बुनिया ,
झिर झिर बुनिया हो झिर झिर बुनिया 

सेनुरा उठावत बाने राम धनुधारियाँ,
सेनुरा उठावत बाने.
पडेला झिर झिर बुनिया,
घूँघटा उठावे सिया दुल्हनियाँ,
पडेला झिर झिर बुनिया,
झिर झिर बुनिया हो झिर झिर बुनिया,
पडेला झिर झिर बुनिया.



"फूल लाओ"

फूल लाओ मलिनिया सजा डालो,
फूल लाओ .२.
जूही फूल लाओ चमेली फूल लाओ,
जूही फूल .
कलियन से सेज सज डालो,
फूल लाओ मलिनिया सज डालो,
फूल लाओ.

काहे के सूत काहे के री सुइयाँ,
काहे के .२.
किनके गले में पहना डालो,
फूल लाओ मलिनिया सज डालो,
फूल लाओ.
रेशम के सूत सोने के री सुइयाँ,
रेशम के.
राम जी के गले पहना डालो,
फूल लाओ मलिनिया सज डालो,
फूल लाओ.

दस पाँच सखी मिल मंगल गाओ,
दस पाँच.२.
राम जी के कोहबर सज डालो,
राम जी के.
फूल लाओ मलिनिया सज डालो,
फूल लाओ .



"सुना हो पाहुन"

सुना हो पाहुन लावा धीरे धीरे छींटहे,
सुना हो पाहुन.३.
धनवा भूजी हम लावा बनवली,
धनवा भूजी .२.
सुना हो पाहुन लावा चोरी ना करीह,
सुना हो पाहुन लावा धीरे धीरे छींटहे,
सुना हो.

दुल्हा दुल्हिन के गाँठिया जोड़ाइल,
दुल्हा दुल्हिन.
सुना हो पाहुन.
सुना हो पाहुन देख साथ निभाइहे,
सुना हो पाहुन देख साथ निभाइहे,
सुना हो पाहुन,
सुना हो पाहुन लावा धीरे धीरे छींटहे,
सुना हो पाहुन.



"पिया के नगरियाँ"

पिया के नगरिया चलली दुल्हनियाँ,
संघवा में डोली कंहार रे 
चलली दुल्हनियाँ,पिया के नगरिया ,
पिया के .

बाबा जे रोवे रामा बैठ दुवरिया,
दादी के अँखियाँ लाल रे,
पिया के नगरिया.
संघवा में डोली कंहार रे,
पिया के नगरिया.

अम्माँ जे रोवे रामा मली मली अँखियाँ,
बाबू रोवे दिल थाम रे,
पिया के नगरिया.
संघवा में डोली कंहार रे,
पिया के नगरिया.

चाचा जे रोवे रामा बैठ दलनिया,
चाची जे रोवे अँचरा थाम रे,
पिया के नगरिया.
संघवा में डोली कंहार रे,
पिया के नगरिया.

बहिनी जे रोवे रामा खड़ी अंगनवा,
भैया जे रोवेले डोलिया थाम रे,
पिया के नगरिया.
संघवा में डोली कंहार रे,
पिया के नगरिया चलली दुल्हनियाँ,
संघवा में डोली कंहार रे,
पिया के नगरिया.



"सेनूरवा"

बेटी चुटकी सेनूरवा भईल परायी,
बेटी चुटकी.२.
ससुरवा लोगवा आइ गैले ना,
बेटी चुटकी .

जो हम जानती ससुरवा लोगवा आइहे,
जो हम जानती .
दादी के गोदिया में जाती लुकाई,
ससुरवा लोगवा घूम जैहे ना,
जो हम .
बेटी चुटकी.
ससुरवा लोगवा.

बेटी चुटकी सेनूरवा भईल परायी,
ससुरवा लोगवा आइ गईले ना,

जो हम जानती ससुरवा लोगवा आइहे,
अम्माँ के गोदिया में जाती लुकाई,
ससुरवा लोगवा घूम जैहे ना,
जो हम.
बेटी चुटकी .
ससुरवा लोगवा.

जो हम जानती ससुरवा लोगवा आइहे,
भाभी के गोदिया में जाती लुकाई,
ससुरवा लोगवा घूम जैहे ना,
जो हम .
बेटी चुटकी.
ससुरवा लोगवा.

जो हम जानती ससुराल लोगवा आइहे,
दीदी के गोदिया में जाती लुकाई,
ससुरवा लोगवा घूम जैहे ना,
जो हम .
बेटी चुटकी.
ससुरवा लोगवा.

बेटी चुटकी सेनूरवा भईल परायी,
ससुरवा लोगवा आइ गैले ना.
बेटी चुटकी.
ससुरवा लोगवा.

Listen to these songs here: https://www.youtube.com/watch?v=niFG-tuy15I

Wednesday, 18 October 2017

भोजपुरी गाने और अनारकली


अभी कुछ दिनो पहले ही मैंने इक फ़िल्म देखी "अनारकली ऑफ़ आरा".फ़िल्म बहुत प्रभावशाली है और आप को बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है. इस फ़िल्म को देखते समय मुझे बचपन में देखी फ़िल्म "तीसरी क़सम" की बार बार याद आ रही थी क्यूँ की कहीं न कहीं दोनो फ़िल्मों की कहानी में बहुत समानता है. साथ ही दोनो फ़िल्मों के बीच का जो समय अंतराल है वो समाज के परिवर्तन, औरतों के बदलते सामाजिक स्थान और गरिमा का महत्त्व बताता है.
       दोनों फ़िल्मों में नायिका इक लोक कलाकार होती है और अलग अलग जगहों पर मंच पर नाच गा कर अपना व परिवार का भरण-पोषण करती है. स्वाभाविक है कि नाचने गाने वाली औरत को हमारे समाज में अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता है.बड़े फ़िल्मी सितारों की बात अलग है लेकिन छोटे शहर या क़स्बों में इसे बुरा ही माना जाता है. लोग इनके गीत और नृत्य को तो बहुत enjoy करते है, पर इन्हि कलाकारों को सम्मान नहीं देते है. सभी इनको आसानी से उपलब्ध मनोरंजन का साधन समझते हैं और इनके साथ छेड़खानी या मनमानी करना अपना अधिकार मानते हैं. लोग ये मान कर चलते है की नाच गा रही है तो इसकी क्या ही इज़्ज़त होगी और मैं जो चाहूँ इसके साथ व्यवहार कर सकता हूँ.
            पता नहीं कब से ये सोच हमारे पुरुष प्रधान समाज में चली आ रही है और पता नहीं कब समाप्त होगी. दोनों फ़िल्मों में दिखता है की नायिका जब भी मंच पर कार्यक्रम करती है तो उसे लोगों के ताने, व्यंग भरी बातें सुननी पड़ती है. कुछ प्रभावशाली लोग तो उन्हें छेड़ना, कटाक्ष मारना और कभी-कभी तो अश्लील हरकतें करना अपना जन्म सिद्ध अधिकार ही समझते है.
             "तीसरी क़सम" में नायिका हीरा बाई पुराने समय में यही सब कुछ सहन करती रहती है और उसका इक मात्र सचमुच चाहने वाला हीरामन भी ग़रीब और दलित सा ही होता है तो वो सब कुछ देख कर दुखी हो कर भी उसके लिए आवाज़ नहीं उठा पता है. वो और हीरा बाई रोज ही अपमान देखते और सहते हैं लेकिन समाज के सम्मानित लोगों के विरोध में आवाज नहीं उठा पाते है.लेकिन ये बहुत पुराने समय की बात थी. अब आते हैं "अनारकली ऑफ़ आरा" की नायिका के पास, वो भी अपना जीवन यापन मंच पर नाच गा कर ही करती है और उसके साथ भी वही सब कुछ होता है, सार्वजनिक रूप से छेड़खानी, अश्लील जुमले बोले जाते है. क्यूँ की उनके जीवन में ये रोज़मर्रा की बात होती है इसलिए अनारकली काफ़ी हद तक सब कुछ बर्दाश्त करती रहती है लेकिन इक कार्यक्रम के दौरान इक "so called" इज़्ज़तदार आदमी नशे में धुत हो कर मंच पर सबके सामने ही उसे छेड़ने   लगता है तो वो बर्दाश्त नहीं करती. उस प्रभावशाली व्यक्ति से बदला लेने की कठिन लड़ाई लड़ती है.
यही अंतर है पुराने ज़माने की हीरा बाई और नए दौर की अनारकली में. एक सब कुछ सह जाती है जबकि दूसरी समाज से विद्रोह करती है अपने अधिकारों के लिए. 
वह अपने पेशे या संगीत से भागती नहीं है पर उस व्यक्ति को पूरे समाज के सामने शर्मिंदा कर के हमें ये संदेश देती है की चाहे वो किसी भी पेशे या वर्ग की हो उसकी भी उतनी ही इज़्ज़त है जितनी हमारी या आपकी.
हालाँकि मुझे इस फ़िल्म के प्रमोशन के लिए कोई पैसे नहीं मिलें है पर मेरी राय में आपको ये फ़िल्म एक बार ज़रूर देखनी चाहिए. छोटे शहरों और क़स्बों में रहने वाले लोग फ़िल्म की बारीकियों से ख़ुद को relate कर पाएँगे. 

इस फ़िल्म को मैंने अपने ब्लॉग में ख़ास कर के इस लिए जगह दी है क्यूँकि मेरी समझ में ये आधुनिक हिंदी सिनमा में लोक संगीत का सबसे सटीक चित्रण है. गाने पूरी तरह से मिट्टी से जुड़े हुए हैं. लगता ही नहीं की बॉलीवुड के म्यूज़िक studios में बनाए गए हों.
कहानी की माँग देखते हुए गानो के कुछ हिस्से बोल्ड ज़रूर हैं पर अश्लील नहीं. 
इनमें असली लोक गीतों की मस्ती है, चटकीलापन है. उत्तरप्रदेश ओर बिहार के गाँवों में होने वाली नौटंकी जिन लोगों ने देखी होगी उन्हें पुराना समय याद आ जाएगा.



"ए दरोग़ा"

दिलों से खेलते हो या
आके कोई
जुंग करतें हो 2
आ दुनाली लेके सरकारी हम
क्यूँ तंग करते हो

आए ज़रा घिस ले तनिक रगड़ ले
आए ज़रा घिस ले तनिक रगड़ ले
आए दारोगा दुनालिया में जुंग
लागे हो..
आए दारोगा दुनालिया में जुंग
लागे हो..
ऐसे आंते हो मुच्छवा दबंग्ग लगे हो
आए ज़रा घिश ले
आए दारोगा, आए दारोगा दुनालिया में जुंग
लागे हो..
आए दारोगा दुनालिया में जुंग
लागे हो..

ताम ताम घोड़ा उतरा खेल में
रिस्क तोड़ा तोड़ा ताल मेल में 2
ढाए बार उच्छला और हाफ़ गया
आए हाए काफ गया
छ्होटी सी डेहरी ना लाँघ पाया
ज़रा थम जा बिना कती कमरिया में बाल लागे हो
ऐसे हाफे है जियरा से हम जाला हो

आए ज़रा घिस ले तनिक रगड़ ले
आए ज़रा घिस ले तनिक रगड़ ले
आए दारोगा दुनालिया में जुंग
लागे हो..
आए दारोगा दुनालिया में जुंग



मोरा पिया मतलब का यार



हमरा के कन्फ्यूजिया के गया 
खिड़की से पटना दिखा के गया 
हमरा त चौखट के भीतरीही जुल्म है 
सईयाँ घुमक्कड़ को धरती भी कम है

सूट बूट जुलमी तैयार 
मोरा पिया मतलब का यार 

भीतर ही भीतर बदन सारा टूटे 
सईयाँ मजा जा के दुबई में लुटे 
भीतर ही भीतर बदन सारा टूटे 
सईयाँ मजा जा के दुबई में लुटे 

हमरी जवानी न बिस्तर न खाट के 
हमसे ही सारा कनेक्सन वो काट के 
हाय जोड़े है दुनिया से तार 
ऐ मोरा पिया मतलब का यार 

सूट बूट जुलमी तैयार 
मोरा पिया मतलब का यार 

हमसे हटके चले उनसे सटके 
उसका कैरक्टर ये दिलवा में खटके 
हमसे हटके चले उनसे सटके 
उसका कैरक्टर ये दिलवा में खटके 
वादा निभायेंगे जुमला गिराई के 
गोल गोल हमका जलेबी खिलाई के 
बड़ा बतिया करे रसदार 
मोरा पिया मतलब का यार 



लहंगा झांके


हम का देखे सुरती फांके 
चोर नज़र से लहंगा झांके रे...
हम का देखे सुरती फांके 
चोर नज़र से लहंगा झांके रे...
रे हटा ले नजरिया के खींचे मुवा डोर
सरक सरक सरकाई ले...लंहगा मारे ला जोर..
सरक सरक सरकाई ले...ई लहंगा मारे ला जोर 

जल बिन मछरिया सी तड़पू रोज़ रोज़ 
आजा रस निचोड़ राजा 
घटक घटक घटकाई ले...चढ़ाई ले..
जवानिया मारे ला जोर..
सरक सरक सरकाई ले 
ई लहंगा मारे ला जोर 



भुला हमका दिल्ली जाईके, हमरा चितचोर जी..
भुला हमका दिल्ली जाईके, हमरा चितचोर जी..
खटिया पे सोये आके..दूर बड़ा दूर जी...
अंगिया बे सहूर राजा 
धड़क धडक धड्काई ले..चढ़ाई ले..
ई जियरा मारे ला जोर 
सरक सरक सरकाई ले 
ई लहंगा मारे ला जोर...
सरक सरक सरकाई ले 
ई लहंगा मारे ला जोर...




सा रा रा रा 

नार देख के लार गिराए राजा जी 
मूह में पानी देख जवानी झट बौराये राजा जी 
गैया आपनी बहने मैया
दूजी दूध मलाई जी 
हरे नोट लंगोट में घुस कर खलबल खलबल राजा जी 

नहीं ख़िलोना औना पौना राजा जी
मुच्छिया उखाड़ देख धोबिया पछाड़ देख 
देवी सवार देख सा रा रा रा रा
आज होगा साँवरिया सा रा रा रारा
चल नाच लहरिया सा रा रा रा रा

अबला बवाल देख ड़ायन छिनाल देख
कुलटा कमाल देख सा रा रा रा रा
आज होगा साँवरिया सा रा..
चल नाच लहरिया सा रा..

छातिया पे रख के चला दे तू बंदूकिया कि अब तो गुलमिया की नाह नाह नाह नाश 
बनिहे तो बनिहे हाँ सच में ख़बरिया की छुए गा जो हमका बिन हाँ हाँ
मन बदन में मोरे सा रा रा रा रा
सर चढ़ कर तोहरे सा रा रा रा
तन नाचे झकझोरे सा रा रा रा
घन घन घन घोरे सा रा रा रा
तन नाचे झकझोरे सा रा रा रा

हमरे बदनवा की हम महरानिया की तुमरि जागीरियाँ की नाह नाह नाह
होईए तो होईए रे बड़ा जमिंदरवा की हमरी डगरिया की हम राजा
मन बदन में मोरे सा रा रा रा रा
सर चढ़ कर तोहरे सा रा रा रा
तन नाचे झकझोरे सा रा रा रा
घन घन घन घोरे सा रा रा रा
तन नाचे झकझोरे सा रा रा रा



Disclaimer: These songs are from the film Anarkali Of Aarah. Original composer: Rohit sharma.