Monday, 30 July 2018

“आया सावन झूम के”


ऐसा लगता है जैसे धरती ने फिर एक बार स्नान कर के धानी चुनरिया ओढ ली है चारों ओर हरियाली छायी हुयी है.हर पत्ता हर बूटा रिमझिम फुहार से धुल कर चमक उठे हैं.ये है सावन का महीना जब धरती अपने पूरे सौंदर्य पर होती है.पपिहा,झिंगुर मोर अपने स्वर व सौंदर्य से सब का मन मोह लेते हैं.
स्त्रियाँ सखी सहेलियों के साथ सजती सँवरती है पेड़ों पर झूले पड़ जाते है,गोरियों की कलाइयाँ हरी हरी चूड़ियों और मेहंदी से सज जाती है और फिर शुरू होती है रिमझिम फुहार के साथ लय मिलाते हुए ढोलक के साथ कजरी गाने की.......अब आप सोच रहे होंगे की कहाँ होता है ये सब बस किताबी बातें हैं,जी हाँ सच है आज की मशीनी ज़िंदगी में ये सब लोग भूलते जा रहे हैं ना तो झूले पड़ते हैं ना वो समय है ना वो लोग जो कजरी गाते है. पहले आप को कजरी के बारे में बता दूँ ,लोकगीतों में कजरी वो विधा है जो केवल सावन,भादों में गायी जाती है अपने अनूठे रंग रूप में,कजरी गाने की राग भी बहुत अलग होती है.पहले तो पूरे सावन भादों घर-घर स्त्रियाँ टोली बना कर ढोल मंजीरे के साथ सुर मिला कर कजरी,झूला गा कर समां बाँध देती थी.
अब तो किसी महोत्सव में एक दिन का स्थान मिल जाए ऐसे गीतों को यही बहुत हैं.ग़लती हमारी है हमें ही अपनी नयी पीढ़ी को अपनी विरासत से परिचित कराना चाहिये.
ये देख कर ख़ुशी होती है की कुछ-कुछ जगहों पर आज भी स्त्रियाँ चाहे तीज celebrate करने के लिए या club gathering के बहाने ही सावन,झूला और कजरी गाने का कार्यक्रम रखती हैं इसका सबूत आप लोगों के Facebook status से देख सकते हैं,पर दुविधा ये होती है की कजरी बहुत कम लोगों को आती है,तो चलिए कुछ बहुत ही लोकप्रिय और मनमोहक कजरी गीतों का गुलदस्ता आप सब के लिए इस सावन पर सप्रेम भेंट.



“जैसा कि कजरी के परिचय में आप जान चुके हैं की इन गीतों में स्त्रियों के हार-सिंगार मेहंदी-झूला प्रकृति का वर्णन और बहुत सी चुहलबाज़ी होती है तो साथ ही ये सावन का माह भगवान “शिव” की आराधना के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है,और जहाँ झूला हो गीत हो रस हो वहाँ “श्री कृष्ण” का का नाम कैसे ना हो,इसलिए अधिकतर गीतों में इन सब का वर्णन मिलता है.

                     
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“गोदना”

अरे रामा गोदना,ग़ोदावे केहु प्यारी
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी...२

केहु ग़ोदावे नाम पति के केहु ओम् 
ग़ोदावे रामा
अरे रामा केहु 
अरे रामा केहु ग़ोदावे बनवारी 
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी 

अरे रामा गोदना ग़ोदावे केहु प्यारी 
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी...२

केहु ग़ोदावे सीता राम केहु शंकर 
ग़ोदावे रामा 
अरे रामा केहु 
अरे रामा केहु ग़ोदावे गिरधारी
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी

अरे रामा गोदना ग़ोदावे केहु प्यारी
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी...२

केहु ग़ोदावे राधे श्याम हनुमत 
केहु ग़ोदावे रामा
अरे रामा केहु 
अरे रामा केहु ग़ोदावे मुरारी 
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी....२

अरे रामा गोदना ग़ोदावे केहु प्यारी 
गोदेलि गोदनहारी ऐ हरी...२
 

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“आये सावन”

आए सावन ओ मनभावन
लखिए बरखा की बहार
आए सावन..२

गुल्म लता तरु बेल सुहावन
फूले फूल हज़ार साँवरिया
फूले फूल हज़ार...२

आए सावन ओ मनभावन
लखिए बरखा की बहार
आए....२

जूही चम्पा चमेली फूले
फूल रहे कचनार
फूल रहे कचनार साँवरिया
आए....२

आए सावन ओ मनभावन
लखिए बरखा की बहार
आए.....२

दादूर मोर पपिहा बोले
झींगूर की झनकार
झींगूर की झनकार साँवरिया
आए....२

आए सावन ओ मनभावन
लखिए बरखा की बहार
आए....२

राम लली सत की पटरी पर
झूलत बारम्बर साँवरिया
झूलत बारम्बर
आए...२

आए सावन ओ मनभावन
लखिए बरखा की बहार
आए....२

                               
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“मोती झील”

पिया मेहंदी मँगाई दा मोती झील से
जा के साइकिल से ना...२

हमके मेहंदी मँगाई दा छोटकी 
नन्दी से पिसवाई दा
हमरे हाथे पे लगाई दा काँटे जीर से 
जा के साइकिल से ना 
पिया मेहंदी....२

ई है सावनि बहार माना बतिया हमार 
कौनो फ़ायदा ना निकली दलील से 
जा के साइकिल से ना....२

पिया मेहंदी मँगाई दा मोती झील से 
जा के साइकिल से ना...२

पकड़ लई बाग़बान चाहे हो जाए चालान
तोहके लड़ के छुड़ा लेब अपील से 
जा के साइकिल से ना....२

पिया मेहंदी मँगाई दा मोती झील से 
जा के साइकिल से ना...२

Friday, 15 June 2018

नमस्कार।  
इंटरनेट की इस विशाल दुनिया में आप "संझा -भोऱ " नाम के इस ब्लॉग तक पहुंचे , इसके लिए आप को बधाई।  आपका स्वागत है. आइये, यहीं से शुरुआत करते हैं. यदि अब भी आपको गांव या छोटे शहरों की शादियों में  जाने का,  और कुछ दिन रुकने का, मौका मिलता है तो आप समझ  पाएंगे  की कैसे सुबह की नींद गांव की औरतों के गाने से "disturb " होती है.  कुछ  बुजुर्ग औरतें हर सुबह शाम अपनी टोली सी बना के, पुरानी सी दरी बिछा के , कुछ सुने सुनाये से गीत गा  रही होती हैं.  इन गीतों की धुन आपको जानी पहचानी सी  लगती है ,  मन में दोहराते भी हैं - पर यह गीत बढ़ते वक़्त के साथ कहीं छूट गयें हैं. इसी भूली बिसरी धरोहर से आपको दोबारा  जोड़ने का प्रयास है- Sanjhaa-Bhor

हमारे गीतों  का संकलन आपके लिए पुराने लोक संगीत का आनंद उठाने की एक नयी खिड़की खोलेगा। 
पढ़िए और गांव की शादियों को, दादी की कहानियो को, घर के पुराने आँगन को याद करिये.  

Wednesday, 21 March 2018

चैत की गुनगुनाती धूप




अभी फ़ागुनी रंग और फ़ाग़ के सुरों की खनक बाक़ी ही थी की,नववधु की तरह मंथर व सुरीली चाल के साथ ही चैत की गुनगुनाती धूप और महकती हवा ने हमारे दिलों पर दस्तक दे दी.
             यही तो ख़ासियत है हमारी पुरानी परम्पराओं की,कोई भी मौसम हो या कोई भी त्योहार सबकी अपनी ख़ास अहमियत है और अपनी पहचान.ऐसा ही ख़ास मौक़ा होता है चैत महीने का,ये वो समय होता है जब खेतों में गेहूँ की सुनहरि बालियाँ लहलहा रही होती हैं और किसान उनकी कटाई का आयोजन करते हैं. ये सबके लिए बहुत ख़ुशी का मौक़ा होता है किसान को अपने परिश्रम का फल मिलता है घर में सुख व समृद्धि आती है,इसलिए चैत मास में लोग बडे उमंग व उत्साह से भरे होते है साथ ही इस माह में "चैता" या "चैती" गाने की बड़ी पुरानी परम्परा है. ऐसा खेतों में कटाई के समय काम करते-करते भी गाते है और अक्सर शाम को कटाई के बाद गाँव के चौपाल पर जब लोग जमा होते हैं तो दिन भर की जी तोड़ मेहनत के बाद कुछ आनंद के पल गा बजा कर ख़ुश हो लेते थे."थे" मैंने इस लिए लिखा कि धीरे-धीरे ये परम्परायें कहीं खोती जा रही है. मुझे बहुत दुःख होता है जब मैं देखती हु की ऐसे गीत या परम्परायें अब केवल कुछ बडे शहरों में होने वाले आयोजनो की शोभा बन कर ही रह गयी हैं,उनका वास्तविक स्वरूप कहीं खो गया हैं.
          इसीलिए मैंने एक छोटा सा प्रयास  किया है कि ऐसे भूले-बिसरे गीत "संझा-भोर" के माध्यम से आप तक पहुँचा सकूँ.
      तो चलिये आप को चैता और चैती के बारे में कुछ रोचक बातें बता दूँ.....जैसा कि पहले ही बता चुकी हूँ मूलतः ये फ़सल की कटाई पर आधारित होता है,गाने मस्ती भरे होते हैं,अक्सर विवाहित स्त्रियाँ फागुन में मायक़े गयी होती हैं और उनके ससुराल लौटने का समय भी होता है तो,संयोग और वियोग रस का भी आनंद होता है.अधिकतर चैता या चैती समूह में ढोलक की थाप और मंजीरे की झनकार के साथ ही होता है.चैता गाने की राग बहुत अलग व मनभावन होती है,ये classical और लोकगीत दोनो रूपों में गाया और बहुत पसंद किया जाता है .तो लीजिए कुछ पारम्परिक चैता,चैती का आनंद.
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"सूतल सैयाँ"


अरे साँझ के बेर थाकल हारल
आइ के सजन सूतल परल बा,
अरे कोयल कूक से हूक उठे,
कहीं जागे ना बालम प्राण डरल बा.

सूतल सैयाँ के जगावे हो रामा
कोयल बड़ी पापी -३
कोयल बड़ी पापी कोयल बड़ी पापी 
सूतल सैंया के.......२

रोज रोज़ बोले कोयल साझँहो
बिहनवा -२
आज बोलेलू आधी रतिया 
कोयल बड़ी पापी 
ज़री से कटैबो खनी बगिया हो रामा 
कोयल बड़ी पापी -२
सूतल सैयाँ के.......२
कोयल बड़ी पापी 

होवे द सवेर कोयल खोतवा उज़रबो
होवे द.....२
अरे ज़री से कटेबो खनी बगिया हो रामा 
कोयल बड़ी पापी 
सूतल सैंया के....२
कोयल बड़ी पापी .

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"नयी झूलनी "

नयी झूलनी की छैयाँ बलम 
दूपहरिया बिताई जा हो....३

चार महीना है गरमी के दिनवा
अरे चार महीना 
तर तर चुवे पसीनवा बलम तनी
बेनिया डोलाई जा हो......२
नयी झूलनी की.......२

चार महीना बरखा के दिनवा
अरे चार महीना 
रिमझिम,अरे,रिमझिम बरसे सवनवा 
बलम तनी बंगला छवाई जा हो 
रिमझिम बरसे....२
नयी झूलनी की....२

चार महीना है जाड़ा के दिनवा
अरे चार महीना 
थर थर काँपे बदनवा बलम तनी 
गरवा लगाई ला हो 
अरे,थर थर....२
नयी झूलनी की...२


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"गोरी बहियाँ"

हो,रामा गोरी गोरी बहियाँ.....३
हरी हरी चूड़ियाँ हो रामा चैत मासे...२
हो रामा गोरी गोरी बहियाँ

चैता मासे झूलनी गढ़ाईब हो गोरी चैता मासे......३
ऐ रामा गोरी गोरी बहियाँ....२

ऐ गोरी घर से जब निकर 
ऐ गोरी...३
अरे कजरा लगाई लिहल कर गोरे गलवा
अरे कजरा....२
टोनहा बा सबके नज़रिया हो रामा 
तनी बची के....२
ऐ रामा गोरी गोरी बहियाँ...२

ऐ गोरी जुल्मी तोरी अँखियाँ
ऐ गोरी जुल्मी तोरी अँखियाँ
अरे,हमके सतावे सारी रतिया 
बाँके नैना 
अरे हमके सतावे.....२
ऐ रामा गोरी गोरी बहियाँ....२

ऐ गोरी सुतेलि हम खरिहानी
अरे ऐ गोरी सुतेलि......२
सुतेलि हम खरिहानी
अरे हमके बुलाईं लिहल कर सेजिया
हमके बुलाईं.....२
ऐ रामा गोरी गोरी बहियाँ.


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"अमवाँ"

सब बन अमवाँ बहोरब हो रामा चैत महिनवा....३

कौने मासे अमवाँ बौरन लगे
कौने मासे लागे ला टिकोरवा हो रामा चैत महिनवा 
कौने मासे......२

माघे मासे अमवाँ बौरन लागे
चैत मासे लागे ला टिकोरवा हो रामा चैत महिनवा
माघे मासे......२

सब बन अमवाँ बहोरब हो रामा चैत महिनवा....२

कौने मासे गोरीया बिरहन लागें
कौने मासे कूके कोयलीया हो रामा चैत महिनवा
फागुन मासे गोरीया बिरहन लागे
अरे चैत मासे कूके कोयलिया हो रामा चैत महिनवा.....२

सब बन अमवाँ बहोरब हो रामा चैत महिनवा.

Tuesday, 6 February 2018

"शिवरात्रि विशेष "




सौभाग्य शाली होते है वो लोग जिन्हें बचपन में दादा,दादी, और नाना,नानी, की गोद उनका प्यार,दुलार बहुत सारी सीख और कहानियाँ सुनने को मिलती हैं.
         दादा,दादी का तो साथ मुझे मिला और उनसे बहुत कुछ सीखने को भी मिला,हम तीन भाई बहन हैं और बिगड़े हुए बच्चे माने जाते हैं जिसकी ज़िम्मेदारी दादा,दादी को ही जाती हैं.
            किंतु ,दुर्भाग्य वश मैं अपने नाना,नानी को देख भी नहीं पायी मैं जब बहुत छोटी थी तभी उनका देहांत हो चुका था.मैंने अपनी माँ से ही उनके बारे में सुना है और जो सुना है वो बहुत ही असाधारण  व आश्चर्यजनक है,विशेषकर मेरी नानी के बारे में वो उतने पुराने ज़माने में भी काफ़ी पढ़ी-लिखी व बहुमुखी प्रतिभा की धनी थी.ईश्वर ने उन्हें गीत-संगीत,सीना-पिरोना जैसे अनेक कलाओं से सजाया था,वे अपने गीत ख़ुद लिखती थी और संगीत बद्ध भी करती थीं और वो निश्चय ही अमूल्य हैं.उनके अधिकतर गीत राग,रागिनियो और मौसम पर आधारित होते थे.आज ये बताते हुए मुझे बहुत दुःख हो रहा है की मेरी नानी जी द्वारा लिखे बहुमूल्य गीत व कविताओं का कोई संकलन नहीं हो सका,शायद तब लोगों ने उसका सही आंकलन नहीं किया,उस अमूल्य धरोहर को खोने का दर्द मैं बता नहीं सकती.
        हाँ, कुछ गाने हैं जो मेरी माँ और मामी लोगों के स्मृति में अभी संचित हैं. अभी मौक़ा भी है और दस्तूर भी देवों के देव "महादेव" का महा पर्व शिव रात्रि क़रीब है और इस पावन अवसर पर मैं अपनी नानी को श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए उनके कुछ भजन आप तक पहुँचा रही हूँ.
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"शंकर दयाल"

लीजे शंकर दयाल ख़बरिया मोरी
हाँ,लीजे शंकर दयाल 
लीजे शंकर .

जग में गंग बहे पाप नाशक दुःख हरनी 
जग में गंग बहे 
इसी से नाम जगत में तारण तरनी 
इसी से नाम 
हरी द्वारे पे मोक्षत कीजे मोरी 
लीजे शंकर .
हाँ,लीजे शंकर दयाल 


भाल पे चन्द्र तिलक तीन नेत्र साजे हैं
भाल पे चन्द्र 
हाथ डमरू भी लिए नंदी पे विराजे है 
हाथ डमरू भी 
आओ दीन दयाल नगरिया मोरी 
आओ दीन दयाल .

लीजे शंकर दयाल ख़बरिया मोरी 
हाँ,लीजे शंकर दयाल 
लीजे शंकर .

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"नमन"

नमः हो नमः हो नमः प्राणदाता 
नमः हो नमः हो नमः प्रियदाता 
नमः हो .

नमस्ते निराकार निर्दोष नायक 
नमस्ते परम मित्र सबके सहायक 
नमस्ते निराकार 
नमस्ते परम .


नमो दुःख भँजन नमस्ते निरंजन 
नमो सच्चिदानंद घट घट के व्यापक 
नमो दुःख 
नमो सच्चिदानंद.
नमो नाड़ियों नस के बंधन से बाहर 
नमो सर्व आधार किरपा के सागर 
नमस्ते निराकार .
नमस्ते परम .

नमः हो नमः हो नमः प्राणदाता 
नमः हो नमः हो नमः प्रियदाता 
नमस्ते निराकार 
नमस्ते परम.

तुम्हीं को नमस्ते है हे जन्मदाता 
तुम्हीं को नमस्ते है सायं और प्रातः 
तुम्हीं को नमस्ते
तुम्हीं को नमस्ते है सायं और प्रातः 

नमः हो नमः हो नमः प्राणदाता 
नमः हो नमः हो नमः प्रियदाता 
नमः हो .


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"शंकर"


शंकर तेरी जटा से बहती है 
गंग धारा 
शंकर तेरी जटा से बहती है 
गंग धारा 
काली घटा के अंदर जिमी यामीनि
उज़ारा
शंकर तेरी 

द्रिग तीन तेज़ राशि कटी कंध 
नाग फाँसी
गिरिजा है संग दासी 
सब विस्व के आधारा
शंकर तेरी 

गले मुण्ड माल राजे शशि भाल 
पे विराजे 
डमरू निदान बाजे 
कर में त्रिशूल भाला
शंकर तेरी 

शंकर तेरी जटा से बहती है 
गंग धारा
काली घटा के अंदर जिमी यामीनि 
उज़ारा 
शंकर तेरी .


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"शिव"

जटा में गंगा जी बहार करें
भक्तों का बेड़ा शिव पार करे 
जटा में 
भक्तों का 

शिव जी बैठे भभूति रमाए
गले सर्पों का हार सुहाये
डमरू मधुर झनकार करे 
अरे,डमरू मधुर झनकार करे 
भक्तों का 
जटा में 

रटे जो नित नित बम बम भोला 
निर्मल होवे उसका चोला 
दर्शन जो जन इक बार करे 
भक्तों का 
जटा में 

ओढ़े बाबा जी बाघम्बेर
काँधे सोहे जनेउ सुंदर 
अरे भांग धतूर आहार करे 
भांग धतूर का आहार करे 
भक्तों का 
जटा में 

नंदी गण सोहत हो ऐसे 
सागर मध्य कमल हो जैसे 
अरे मस्तक पर चंदा उज़ियार करे 
मस्तक पर चंदा उज़ियार करे
भक्तों का 
जटा में गंगा जी बाहर करे 
भक्तों का बेड़ा शिव पार करे .

Sunday, 28 January 2018

MELA aur MASTI !



कुछ ऐसी यादें या बातें आप को याद रह जाती है जिन से आप को लगाव होता है.मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ जब मैं famous folk singer मालिनी अवस्थी जी से मिली,मैं इसे अपना सौभाग्य मानती हूँ की इटावा महोत्सव के माध्यम से जिन्हें मैं अपना गुरु मानती हूँ उनसे मिल पायी और अच्छा समय बिताया.वो समय हमेशा मेरे स्मृति में संचित रहेगा.


      
 मालिनी जी के द्वारा गाये कुछ गीत मैं आप तक पहुँचा रही हूँ.

पुराने ज़माने में कम उम्र में शादी होना आम बात थी. कई बार तो बच्चों को पता भी नहीं होता था की उनके साथ क्या हो गया माता पिता ही आपस में मिल बैठ कर रिश्ता तय कर विवाह कर देते थे.
समय के साथ जब बच्चे बड़े होते थे तो उनकी मन में तरह तरह के विचार आते थे....एक दूसरे की भावनाओं को समझने का प्रयास करते थे और ऐसे ही प्रयासों में कुछ लोक गीतों का जन्म हो जाता था ऐसा ही इक गीत है जो मालिनी जी ने इटावा महोत्सव के मंच पर गाया और लोगों ने बहुत आनंद लिया.गीत में भाव है की नायिका बार बार अपने पति के बचकाने व्यवहार पर परेशान हो जाती है और अपनी शिकायत गीत में दिखाती है.


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"छोटे से बलम" 

छोटे से नन्हें से हमका मिले रे बालम,
की छोटे से.
बालम छोटे से.
छोटे से नन्हें से.

जब मैं गयी हलवैया दुकनिया
जब मैं,
मिल गए बालम छोटे से,
अरे वही मचलें वही रोयें
लड्डो दिला दो मेरी जान,
की बालम छोटे से.
छोटे से नन्हें से.

जब मैं गयी बजजवा दुकनिया,
मिल गए बालम छोटे से,
अरे वही मचलें वही रोए 
कुर्ता सिला दो मेरी जान,
की बालम छोटे से.
छोटे से नन्हें से.

जब मैं गयी पनवड़िया दुकनिया,
मिल गए बालम छोटे से,
अरे वही मचलें वही रोयें
बीड़ा खिला दो मेरी जान,
की बालम छोटे से.
छोटे से नन्हें से.



मौसम में हल्की ठंड,सज हुआ मंच,दर्शकों की भीड़ और मालिनी जी का गाया इक और लोक गीत,सबके मन को छू गया.मालिनी जी की विशेषता ये है की वो अपने गीतों का चयन,दर्शकों व स्थान के आधार पर करती हैं.यहाँ मैंने ध्यान दिया की वो ठेठ भोझपूरी ना गा कर कुछ अवधी व ब्रज का मधुर राग छेड़ रही थी जिससे सभी झूम जा रहे थे.
वैसे तो ये गीत होली का है पर यहाँ लोक गीत के रूप में गाया गया.
गाने में कृष्ण के साथ गोपियों का परिहास चल रहा है,क्यूँकि इटावा ब्रज भूमि में ही आता है तो लोग बहुत मगन हो कर ऐसे गाने सुनते है.हमारे समाज में तो लोग ईश्वर को भी बाँट लेते है,अयोध्या से और पूरब जाइए तो श्री राम आप के भगवान हैं और इधर ब्रज भूमि आते ही लोग कृष्ण भक्त हो जाते है .चलिए आप तो गीत का आनंद लीजिये.

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"रसिया को नार "

रसिया को नार बनाओ री,
रसिया को 
रसिया को नार बनाओ री,
रसिया को .

बेन्दी भाल नयन बिच काजल,
नयन बिच काजल,
नयन बिच काजल .
नकबेसर पहनावो री,
रसिया को,
रसिया को नार बनाओ री,
रसिया को.

कटी लहंगा और माही कंचकि,
कटी लहंगा और माही,
माही कंचकि हो माही कंचकि,
कटी लहंगा और माही कंचकि,
चुनर सर पे ओढ़ाओ री रसिया को.
रसिया को नार बनाओ री,
रसिया को.


कान्हा जब मोरी बात ना माने,
कान्हा जब .
बात ना माने कान्हा बात ना माने,
यमुना तट पे ख़ूब नचाओ री,
रसिया को,
रसिया को नार बनाओ री,
रसिया को.


सावन का महीना आते ही जैसे सब कुछ बदल सा जाता है जैसे, मौसम, मन  और भावनायें,विवाहित स्त्रियाँ मायक़े जाने की आस लगाए बैठी रहती थी. मन में चाह होती थी की, काश,माँ के घर से बुलावा आ जाये . कुछ दिन तो घर परिवार की ज़िम्मेदारियो से मुक्त हो कर वापस अपना बचपन, पेड़ों पर झूले, पुरानी सखियोंके साथ कजरी और माँ की गोद का आनंद ले सकें. कुछ ऐसे ही भावों को दर्शाता है ये गीत .


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"सावन आया"


अम्माँ मेरे बाबा को भेजो री,
की सावन आया, की सावन .
अम्माँ मेरे .
की सावन आया री.

बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री,
की सावन आया, की सावन.
अम्माँ मेरे बाबा को भेजो री,
की सावन आया.

अम्माँ मेरे भैया को भेजो री,
हो अम्माँ मेरे भैया को भेजो री,
अरी बेटी तेरा भैया तो बाला री,
बेटी तेरा भैया तो बाला री,
की सावन आया.

अम्माँ मेरे बाबा को भेजो री,
की सावन आया री.


बेटी का विवाह और बेटी की विदाई,
हमारी पुरानी परम्परा है.सदियों से ये होता आया है और आगे भी होता रहेगा, भले ही उसका रूप भाव बदल गया है,पुराने ज़माने में बेटी विदा हो कर जाती थी,तो जल्दी अपने मयके वापस नहीं आ पाती थी.जाते जाते जो भाव उसके मन में आते हैं,या पहले से ही कोई शिकायत थी, जो वो कह नहीं पायी घर छोड़ने की जो पीड़ा है वो "अमीर खुसरो " जी द्वारा लिखे गीत में जैसे जीवंत हो उठता है.
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"बाबुल"

काहे को ब्याहे विदेश 
अरे लखिया बाबुल मोहे ,
काहे को ब्याहे विदेश 


हम तो बाबुल तेरे बेले की कलियाँ ,
अरे घर घर मांगन जाए,
अरे लखिया बाबुल मोहे ,
काहे को ब्याहे विदेश .

महलन तले से डोला जो निकला,
अरे बीरन ने खायी पछाड़ 
अरे लखिया बाबुल मोहे,
काहे को ब्याहे विदेश.

भैया को दियो बाबुल ,
महला दूमहला,
अरे हमको दियो परदेस
अरे लखिया बाबुल मोहे,
काहे को ब्याहे विदेश 

अरे लखिया बाबुल मोहे,
काहे को ब्याहे विदेश 
अरे लखिया बाबुल मोहे,
काहे को ब्याहे विदेश .