Tuesday, 12 March 2019

“नकटा”



  
“नकटा” ये भी एक विधा है लोक संगीत की,जो की बहुत ही मनोरंजक व लोक प्रिय है. पहले तो लगता है मैं अर्थ समझा दूँ की नकटा होता क्या है.असल में ये शब्द भी लोक भाषा का ही है.जैसा की सर्व विदित है की उत्तर-प्रदेश की लोक कलाओं में नाटक और नौटंकी ही सर्वाधिक लोकप्रिय रहे हैं,और ये नकटा शब्द यहीं से आता है. इसके गीत बडे ही रसीले,चुलबुले और छेड़-छाड़ से भरे होते हैं.अब देखते हैं की इनका विकास और प्रासंगिकता कहाँ से शुरू होती है. ये मूलतः स्त्रियों द्वारा ढोलक के साथ गया जाने वाला गीत होता है...साथ ही इस पर नृत्य या जैसा की इस का नाम ही परिभाषित करता है अभिनय या नाटक भी किया जाता है.
पहले ज़माने में जब विवाह होता था,विशेषकर लड़कों का और बारात चली जाती थी,और तब बारात में स्त्रियाँ नहीं जाती थीं और बारात भी कम से कम दो या तीन दिन के लिए जाती थीं,तब घर में परिवार व तमाम रिश्तेदारी की स्त्रियाँ ही रह जाती थी और वे मनोरंजन के लिए रतजगा जैसे कार्यक्रम करती थीं. पूरी-पूरी रात गाने-बजाने का कार्यक्रम होता रहता था और तब नकटा का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान होता था. चुटीले से गीतों पर स्त्रियाँ प्रहसन व मंचन करती थीं,उन्ही स्त्रियों में से कोई पुरुष रूप भी बना कर आती थीं....हालाँकि परदा प्रथा भी थी तो स्त्रियाँ लम्बे घूँघट भी किए रहती थी...इस में मज़े की बात ये भी थी की कई बार पता भी नहीं चलता था की किस की बहू कब क्या सुना गयी अपनी सास ननद को गीतों के माध्यम से.सबसे रोचक किसी स्त्री का पुरुष बहुरूप बना कर आना व विनोद भरा दृश्य गीत के साथ अभिनय व मंचन कर के दिखाना होता था,इस में हास्य व कटाक्ष का बड़ा ही सुंदर मिश्रण होता था. नकटा सिर्फ़ इसी अवसर पर नहीं बल्कि शादी-विवाहों के कई और अवसरों पर गाया जाता है.अगर आप ग़ौर करें तो पायेंगे की हमारी छोटी सी भी परंपरा या विधी के पीछे कोई ना कोई logical कारण होता है,जहाँ नकटा गा-बजा कर और रतजगा कर परिवार भर की स्त्रियाँ मनोरंजन करती थीं वहीं ये सुरक्षा की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण था,जैसा की मैंने पहले ही बताया सभी पुरुष बारात में चले जाते थे....तो गाँव में चोरी और डकैती का बड़ा डर होता था,तो रात भर जाग कर ये सब मनोरंजन के साथ अपनी सुरक्षा भी कर लेती थीं.ऐसी अनूठी थीं हमारी लोक कलायें व परम्परायें.आप ने भी अपनी दादी नानी से ऐसे कुछ क़िस्से ज़रूर सुने होंगे.
तो चलिए,ले चलते हैं आप को नकटा गीतों की अद्भुत व रसीलि दुनिया में...आशा है आप को पसंद आयेंगी.

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“मोरे बारे बलमवा”




आवे दा मोरे बारे बलमवा के
आवे दा....२
इक इक में दुई दुई लगाई देबो
हाँ इक इक में....२
आवे दा...२

अपने खाबे पूरी मिठाई
अपने खाबे...२
बलमू के थरिया सजाई देबो
हाँ बलमू...२
सासु जी के उहे टिकरिया
सासु जी के...२
उपरा से चटनी लगाई देबो
हाँ उपरा से....२

आवे दा मोरे बारे बलमवा के
इक इक में...२

अपने रहबे कोठी अटारी
अपने रहबे...२
परदेसी के बंगला छबाई देबो
परदेसी के....२
सासु जी के उहे झोपड़ियाँ
सासु जी के....२
निचवा से माचिस दिखाई देबो
हाँ निचवा से...२

आवे दा मोरे बारे बलमवा के
इक इक में....२

अपने चलबे मोटर कार
अपने चलबे...२
बलमू के साइकिल दिलाई देबो
हाँ बलमू के...२
सासु जी के उहे बैल गड़िया
सासु जी के....२
पिछवा से कुकूर दौराई देबो
हाँ पिछवा से...२

आवे दा मोरे बारे बलमवा के
आवे दा...२
इक इक में दुई दुई लगाई देबो
हाँ इक इक...२
आवे दा मोरे बारे बलमवा के
इक इक...२

                                 
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“अँगूठिया”


कौनो हमरी अँगूठिया चुराई ले गैले
कौनो हमरी...२

हमरी अँगूठिया पिया की निशनिया
हमरी अँगूठिया....२
कौनो पिया की निशनिया चुराई
ले गैले
कौनो पिया की...२
कौनो हमरी....२

हमरी खिड़कियाँ पिया की दुआरिया
हमरी खिड़कियाँ....२
कौनो नैना से नैना लड़ाई ले गैले
कौनो नैना से...२
पिया नैना से नैना लड़ाई ले गैले
कौनो हमरी...२

हमरी चुनरिया पिया की पगड़िया
हमरी चुनरिया...२
कौनो रंग में रंग मिलाई ले गैले
कौनो रंग में....२
कौनो हमरी....२
कौनो पिया की निशनिया चुराई ले गैले
कौनो हमरी...२

हमरी नंदिया पिया की बहिनिया
हमरी नंदिया...२
कौनो पुलिस दरोग़ा भगाई ले गैले
कौनो पुलिस दरोग़ा....२
कौनो हमरी नंदिया भगाई ले गैले
कौनो हमरी....२

कौनो हमरी अँगूठिया चुराई ले गैले
कौनो हमरी...२
हमरी अँगूठिया पिया की निशनिया
कौनो पिया की निशनिया चुराई ले गैले
कौनो हमरी....२



                                        
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“नीली सारी”

गोरा बदन नीली सारी
मैं सारी वाली
गोरा बदन...२

सडिया पहन मैं बग़ियो गयी थी
सडिया पहन....२
मलिया ने हँस के मारा ताली
मैं सारी वाली
मलिया ने....२
गोरा बदन.....२

सडिया पहन मैं क़ुवनो गयी थी
सडिया पहन....२
महारा ने हँस के मारा ताली
मैं सारी वाली
महरा ने....२
गोरा बदन....२

सडिया पहन मैं महलों गयी थी
सडिया पहन...२
राजा ने हँस के दिया गाली
मैं सारी वाली
राजा ने....२
गोरा बदन....२

गोरा बदन नीली सारी
मैं सारी वाली
गोरा बदन....२

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“पिया के बोलिया”

रस घोर घोर पियवा के बोलिया लागेला
रस घोर घोर....२
ऐ हो सासु के बोलिया कैसन लागेला
ऐ हो सासु....२
जैसे निमिया पतैया तितैया लागेला
जैसे निमिया....२

रस घोर घोर पियवा के बोलिया लागेला
रस घोर घोर...२
ऐ हो नन्दि के बोलिया कैसन लागेला
ऐ हो नन्दी....२
जैसे कूनैन के गोलीया तितैया लागेला
जैसे कूनैन...२

रस घोर घोर पियवा के बोलिया लागेला
रस घोर घोर...२
ऐ हो जेठनी के बोलिया कैसन लागेला
ऐ हो जेठनी...२
जैसे ज़हर बूराईल तिरिया लागेला
जैसे ज़हर....२

रस घोर घोर पियवा के बोलिया लागेला
रस घोर घोर....२
ऐ हो देवर के बोलिया कैसन लागेला
ऐ हो देवर....२
जैसे कोयल के बोलिया मीठिया लागेला
जैसे कोयल...२

रस घोर घोर पियवा के बोलिया लागेला
रस घोर घोर...२
ऐ हो सासु के बोलिया कैसन लागेला
जैसे निमिया पतैया तितैया लागेला
रस घोर घोर....२



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“दई के पान”

दई के पान हमारा मन मोह लिया
दई के पान....२
दई के हाँ..दई के पान....२

कहाँ से आया कत्था चूना
कहाँ से आया पान
कहाँ से...२
कहाँ की गोरी कहाँ का जवान
हमारा मन....२
दई के पान.....२

दिल्ली से आया कत्था चूना
बनारस से पान
दिल्ली से...२
बोम्बे की गोरी लाहौर का जवान
हमारा मन...२
दई के पान...२

कहाँ रखूँ कत्था चूना
कहाँ रखूँ पान
कहाँ रखूँ.....२
कहाँ सोवे गोरी कहाँ पे जवान
हमारा मन...२
दई के.....२

हंडिया रखूँ कत्था चूना
डलिया रखूँ पान
हंडिया रखूँ....२
सेज सोवे गोरी बग़ल में जवान
हमारा मन...२
दई के....२

दई के पान हमारा मन मोह लिया
दई के पान....२
दई के हाँ...दई के पान
हमारा मन मोह लिया
दई के....२


“मोर पिया”

झूमत आवे ताड़ी खनवा से मोर पिया
झूमत आवे...२
मोर पिया मोर पिया
मोर पिया...२


हमरे पिया जी की लम्बी लम्बी ज़ुल्फ़ें
हमरे पिया...२
झटकत आवे ताड़ी खनवा से मोर पिया
झटकत आवे....२

झूमत आवे ताड़ी खनवा से मोर पिया
झूमत आवे...२
मोर पिया मोर पिया
मोर पिया...२

हमरे पिया जी की लम्बी लम्बी धोतियाँ
हमरे पिया...२
उलझत आवे ताड़ी खनवा से मोर पिया
उलझत आवे....२

झूमत आवे ताड़ी खनवा से मोर पिया
झूमत आवे..२
मोर पिया मोर पिया
मोर पिया...२

हमरे पिया जी की बड़ी बड़ी अँखिया
हमरे पिया...२
मारत आवे ताड़ी खनवा से मोर पिया
मारत आवे....२

झूमत आवे ताड़ी खनवा से मोर पिया
झूमत आवे...२
मोर पिया मोर पिया
मोर पिया....२
झूमत आवे....२

Monday, 15 October 2018

“नवरात्रि श्रिंखला”- भक्ति के रंग गरबा और डांडिया के संग !



एक बार पुनः शारदीय नवरात्रि के आगमन पर आप सभी को असीम शुभकामनायें.

ये नवरात्रि अपने साथ जीवन में ख़ुशियों के अनेक रंग व साधन ले कर आती है.
जहाँ एक ओर मौसम में ख़ुशनुमा ठंड होती है वहीं जगह-जगह दुर्गा पूजा की धूम 
मची रहती है.उत्तर भारत में तो छोटे-बडे हर शहर में और हर स्तर की रामलीला का
 भी आयोजन होता है और इन सभी कार्यक्रमों को और भी रंगीला बनाता है 
जगह-जगह मेले का मौज और शोरगुल.घर-घर में कलश स्थापना और स्त्रियों की 
टोली का मस्ती में देवी गीत गाना एक अलग ही समा बाँधता है,इन सब के अलावा
 नवरात्रि का एक और अनूठा बहुत लोकप्रिय व मोहक रंग है “गरबा” नृत्य व संगीत.
गरबा मूलरूप से गुजरात प्रांत का लोक संगीत है किन्तु ये गीत और नृत्य इतने 
मनमोहक होते हैं कि अब तो लगभग पूरे देश में बहुत उत्साह से लोग इसका 
आनंद लेते हैं.नवरात्रि पर विशेष तौर पर गरबा गीत व नृत्य का आयोजन किया 
जता है,स्त्री व पुरुष जोड़ियाँ बना कर पुरे group के साथ नाचते-गाते हैं.
इस में डांडिया भी होता है और ये भी बहुत लोकप्रिय है अब तो मैं देखती हूँ प्रायः 
हर शहर में डांडिया और गरबा का आयोजन किया जाता है अक्सर competition
 भी होता है और प्रदर्शन के आधार पर विजेता घोषित किया जाता है.इस गीत 
संगीत का इक और आकर्षक पहलू है इसका परिधान.स्त्री पुरुष दोनों के परिधान
 बहुत ही रंगीन और सुंदर कढ़ाई से शोभित होते हैं,उस पे antique ज़ेवर गहने 
चार चाँद लगाते हैं.हाथों में डांडिया लिए सजे धजे लोग जब शाम को गोला बना 
कर ढोल-ताशे की धुन पर इक साथ थिरकते हैं तो ऐसा समा बँधता है की शब्दों 
में वर्णन करना कठिन है.गरबा में प्रचलित लोक गीत इतने आकर्षक होते हैं कि 
आप के पैर ख़ुद ही मचलने लगते हैं,नाच के लिये.समय के अनुसार इस के रूप में 
भी बहुत परिवर्तन आया है.पहले लोग स्वयं गाते बजाते थे और अब पहले से 
recorded गाने speakers पर बजा कर इसका आनंद लेते हैं.सामान्य तौर पर 
गरबा और डांडिया में बजने वाले गीत गुजराती भाषा में होते हैं पर इस बार मैं आप
 सब के लिये कुछ हिन्दी गरबा के लोक गीत लायी हूँ जिससे आप सब इस 
नवरात्रि में enjoy कर सकते हैं.

                
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“मैया के रंग”

मैं तो गरबा रचाऊँगी
मैया के रंग,रंग जाऊँगी...२
मेरी अम्बा का प्यार मेरी माँ 
का दुलार
अर्ज़ी सुनेंगी माँ जगदम्बे
मैं तो मंदिर में जाऊँगी
माँ की जोत जलाऊँगी
मैं तो गरबा रचाऊँगी
मैया के रंग....२

आँगन बहारूँगी जोत सवाँरूँगी
माता को मैं तन मन से पुकारूँगी 
चुन चुन कलियाँ हार बनाऊँगी 
मात भवानी को हार चढ़ाऊँगी 
माँ को माला पहनाऊँगी
दीपक जोत जलाऊँगी 
मैं तो गरबा रचाऊँगी
मैया के रंग....२

कष्ट निवारेंगी माँ जगदम्बे
विनती सुनेगी अपनी भी अम्बे 
माता के हाथों में मेहंदी रचाऊँगी
लाल चुनरिया मैं माँ को ओढ़ाऊँगी 
माँ को चूड़ी पहनाऊँगी
मैं तो गरबा रचाऊँगी
मैया के रंग....२

हलवा बनाऊँगी भोग लगाऊँगी 
लँगर में भक्तों को भोज कराऊँगी 
नाचूँगी गाऊँगी सबको नचाऊँगी 
नाच नाच मैं तो मैया को रिझाऊँगी 
वर अम्बे का पाऊँगी 
भव से मैं तर जाऊँगी मैं तो गरबा रचाऊँगी 
मैया के रंग,रंग जाऊँगी...२


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“ओढ़नी उड़ी जाय”

ओढ़नी ओढ़ूँ तो उड़ी उड़ी जाय
अरे ये के हुयो अरे काये हुयो....२
ओढ़नी ओढ़ो जी गोरी संभाल
ओढ़नी सर सर सरकी जाय....२

थारो गोरा सा तन हुए तपती किरन
थारो नाज़ुक बदन कुम्हलाय...२
ओढ़नी ओढ़ूँ तो उड़ी उड़ी जाय
अरे ये के हुयो....२
ओढ़नी ओढ़ो जी गोरी सम्भाल
ओढ़नी सर....२

ऊँची नीची तेरी डगरिया
थक जाय माँ पावँ रे
पहली बार चली हूँ माँ
ले के थारो नाम रे...२
ऊँची नीची.....२
ओढ़नी ओढ़ूँ तो उड़ी उड़ी जाय
अरे ये के हुयो...२
ओढ़नी ओढ़ो जी गोरी सम्भाल
ओढ़नी सर...२

कोई सपना में आवे मेरी नीदे उडावे
कोई सपना में...२
दिल धक धक धड़को जाय
दिल धक...२
ओढ़नी ओढ़ूँ तो उड़ी उड़ी जाय
अरे ये के हुयो....२
ओढ़नी ओढ़ो जी गोरी सम्भाल
ओढ़नी सर...२

उड़तो उड़तो मन को पंछी
थारे गाँव में आयो...२
चाँद सरीखा मुखड़ा थारो
नैन मन में समायो...२
या साँची है बात ये जुग जुग
रो साथ...२
अब क़ुणे थारो समझाय
ओढ़नी ओढ़ूँ तो उड़ी उड़ी जाय
अरे ये के हुयो...२
ओढ़नी ओढ़ो जी गोरी सम्भाल
ओढ़नी सर सर सरकी जा ओढ़नी ओढ़ूँ तो....।

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“पीहर चोखो”

ओ माने पीहर भालो लागे
मैं नहीं जाऊँ सासरियो...२
नहीं जाऊँ सासरियो मैं नहीं
जाऊँ सासरियो
ओ माने पीहर....२

सासरे में मेरी सासु जी खोटी....२
ओ माने रोज़ रोज़ पीसड़ पीसावे
मैं नहीं जाऊँ...२
ओ माने पीहर...२

सासरे में मेरा ससुरा जी खोटा...२
ओ माने रोज़ रोज़ घूँघट कढावे
मैं नहीं जाऊँ...२
ओ माने पीहर...२

सासरे में मेरी नंदूलि खोटी...२
ओ माने रोज़ रोज़ पाणि भरावे
मैं नहीं जाऊँ...२
ओ माने पीहर...२

सासरे में मेरी जेठनी खोटी...२
ओ मा पे घड़ी घड़ी हुकुम चलावे
मैं नहीं जाऊँ....२
ओ माने पीहर...२

Monday, 17 September 2018

सन्तान या पुत्र-पुत्री?


शायद हमारा पुरातन समाज ही ज़्यादा समझदार और आधुनिक था.तब तो कहीं कभी “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” जैसे कार्यक्रम कर के समाज को जागृत करने का काम नहीं होता था,आज के ज़माने में हम आए दिन ऐसे कार्यक्रम देखते रहते हैं.कुछ दिनो पहले social media पे मैं देख रही थी सभी अपने whatsapp या fb के status पर “मेरी बेटी मेरा अभिमान” की pic लगा रहे थे,पहले तो ऐसा नहीं होता था,और मुझे नहीं लगता की ऐसा कुछ करने से समाज की सोच बदली जा सकती है.इस को बदलने का इक ही तरीक़ा है,और वो ये की हर व्यक्ति और हर परिवार अपनी सोच और आदतों में परिवर्तन लायें. मैं समझती हूँ की किसी भी समाज को बदलने के लिए किसी बडे कार्यक्रम से अधिक कारगर है की आप अपने आप को व अपनी सोच को बदलें,समाज स्वयं बदल जायेगा. यदि इतिहास उठा कर देखें तो चिर-पुरातन समाज में स्त्री और पुरुष को समान अधिकार थे.और वास्तविकता भी यही है की दोनों इक दूसरे के पूरक है. यदि दोनों में समानता और समागम नहीं होगी तो सृष्टि की रचना सम्भव ही नहीं है. कहने का अर्थ इतना ही है की जितनी आवश्यकता इक पुरुष की है उतनी ही इक स्त्री की भी,नहीं तो सृष्टि का विकास ही रुक जायेगा और इसे हमारे पूर्वज बहुत अच्छे से समझते थे शायद हम ही समझ नहीं पा रहे. इसी लिए वो सन्तान की उत्पत्ति को बहुत आवश्यक व शुभ मानते थे और ऐसे अवसर पर ख़ुशियाँ मानते थे.मध्यकाल तक आते आते समाज को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए कुछ नियम और क़ानून बनाए गए जिनका विस्तार से वर्णन यहाँ सम्भव नहीं किंतु वहाँ भी कभी स्त्री को दोयम दर्जे का या नीचा नहीं समझा गया, पर बीच में बहुत कुछ और होता गया,कभी यवनों का तो कभी मुग़लों का शासन रहा तो स्वाभाविक है की उनके रीति-रिवाजों का हमारे समाज पर भी बहुत असर हुआ और पर्दा प्रथा,स्त्रियों को बंधन में रखना, दहेज आदि बहुत सी ग़लत परम्पराओं का प्रचलन हो गया.ऐसी ही बहुत सी कुरीतियों के कारण शायद लोग पुत्र और पुत्री में भेद-भाव करने लगे. अतः जहाँ सन्तान महत्वपूर्ण थी वहीं पुत्र महत्वपूर्ण हो गया. इसी लिए हमारे लोक गीतों में अधिकतर पुत्र जन्म और उसकी बधाई का ही वर्णन होता है, शायद ही कहीं पुत्री के जन्म का संदर्भ लोक गीतों में आता है. ऐसी ही भ्रांति व्रत को ले कर भी है,जब हमारे समाज की रचना हो रही थी कुछ रीति-रिवाज व त्योहार की संकल्पना की जा रही थी तभी कुछ अवसरों पर सन्तान के लिए व्रत रखने की परम्परा बनी,लेकिन कालांतर में ये पुत्र व्रत की परम्परा तक ही सीमित हो गयी, जिसे की आज की अपने आप को बहुत आधुनिक और updated समझने वाली औरतें भी करती हैं,तो यहाँ आप को समझदारी दिखाने की आवश्यकता है,आप समझें, की व्रत सन्तान के लिए होता है ना की केवल पुत्र के लिए. लकीर का फ़क़ीर बनने की बजाय आप स्वयं समझें की सन्तान महत्वपूर्ण है चाहे वो पुत्र हो या पुत्री. यदि आप अपने बेटे के लिए व्रत रखती है तो अपनी बेटी के लिए भी रखें,समाज बदलेगा भी और विकसित भी होगा. मैं अपने blog पर लिखने के लिये कुछ पुत्री जन्म से सम्बंधित गीत ढूँढ रही थी, बड़ी मुश्किल से इक,दो गीत मिले जो आप से साझा कर रही हूँ.

                                 
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“हमरे बिटिया”

हमरे भयी बिटिया
ऐ टोपी वाले हमार भयी बिटिया...२

देवरनियाँ जेठनियाँ के भैले बेटौवा
देवरनियाँ...२
हमार भयी बिटिया
ऐ टोपी वाले हमरे भयी बिटिया
ऐ टोपी...२

देवरनियाँ जेठनिया तो काम करी
करी मरिहैं
देवरनियाँ....२
हमार करी बिटिया ऐ टोपी वाले
हमार करी बिटिया...२
हमरे भयी बिटिया
ऐ टोपी....२

देवरनियाँ जेठनिया के आइहैं
पतोहिया
देवरनियाँ.....२
हमार आयी दमदा ऐ टोपी वाले
हमार आयी दमदा...२
हमरे भयी बिटिया
ऐ टोपी....२

देवरनियाँ जेठनिया के लडीहें
पतोहिया
देवरनियाँ....२
हमार हँसी दमदा ऐ टोपी वाले
हमार हँसी दमदा....२
हमरे भयी बिटिया
ऐ टोपी...२

हमरे भयी बिटिया
ऐ टोपी वाले हमार भयी बिटिया .

                           
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“काहे रोवे गुड़िया”

काहे के रोवे बिटिया
सबेरे घुनघुन वाँ मँगाई देब हो
काहे रोवे...२

दादा से कहिबे दादी से कहिबे
दादा....२
चाचा से बोले गुड़िया
सबेरे घुनघुन वाँ मँगाई देब हो...२
काहे रोवे...२

अम्माँ से कहिबे बाबा से कहिबे
अम्माँ...२
भैया से बोले रे रनिया
सबेरे घुनघुन वाँ मँगाई देब हो...२
काहे रोवे....२

मामा से कहिबे मामी से कहिबे
मामा....२
मौसी से बोले गुड़िया
सबेरे घुनघुन वाँ मँगाई देब हो...२
काहे रोवे....२

भैया से कहिबे भाभी से कहिबे
भैया...२
दीदी से बोले रे गुड़िया
सबेरे घुनघुन वाँ मँगाई देब हो...२
काहे रोवे...२

काहे के रोवे मोरी गुड़िया
सबेरे घुनघुन वाँ मँगाई देब हो
काहे के रोवे...२

                             
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“तीत लागे”

तीत लागे तीत लागे कडु लागे हो
हरिरा पिया नहीं जाये
हरिरा कडु लागे हो.....२

सास रिसीयीहें हमार का करिहे
सास...२
बहुत करिहे तो देवता ना मनाईंहैं...२
देवता मनाने मेरी अम्माँ आए हो...२
हरिरा पिया....२
तीत लागे....२

जिठनि रिसीयीहें हमार का करिहे
जिठनि.....२
बहुत करिहे तो पीपली ना पिसैहै...२
पीपली पिसाने मेरी भाभी आए हो...२
हरिरा पिया...२
तीत लागे.....२

ननद रिसीयीहें हमार का करिहे
ननद...२
बहुत करिहे तो कजला ना लगैहे...२
कजला लगाने मेरी बहना आए हो..२
हरिरा पिया...२
तीत लागे....२

तीत लागे तीत लागे कडु लागे हो
हरिरा पिया नहीं जाए
हरिरा कडु लागे हो.

Saturday, 8 September 2018

“परम्परिकता की डोर आधुनिकता की ओर”


वैसे तो मैं अपने blog पे केवल लोक गीत और उन से सम्बंधित बातें ही लिखती हूँ, पर समाज की दशा और दिशा देख कर कभी-कभी बहुत कष्ट होता है. सौभाग्य से हमारी पीढ़ी को जहाँ बहुत पुरानी परम्परायें,रस्म, रिवाजों के बारे में पता है वहीं दूसरी ओर technologically में हम इतने आगे बढ़ चुके हैं की कभी अंतरिक्ष में “मंगल यान” भेज रहे हैं तो कभी चाँद पर घर बसाने की भी बात करते हैं.ऐसी ही विचित्र और विभिन्न मानसिकता में हम जी रहे हैं,शायद इसीलिए समाज में संतुलन की बहुत ज़रूरत है.कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जो सिर्फ़ आधुनिकीकरण के ही पीछे भाग रहे हैं तो कुछ पुराने संस्कारों और रीति-रिवाजों को छोड़ नहीं पा रहे हैं.मेरा मानना है कि दोनों धाराओं को साथ ले कर चलने की आवश्यकता है,तभी इक संतुलित और विकसित समाज का निर्माण हो सकता है.इस युग में सम्भव ही नहीं है की हम हर तरह से updated ना हों,समाज का विकास ही रुक जायेगा इसलिए आगे बढ़ें नए प्रयोग कर अपना व समाज का उत्थान करें. मेरे इस post में बच्चे के जन्म से सम्बंधित बातें और गाने थे.आज मैं आप को “लचारी” के बारे में बताने वाली थी,पर लिखते समय मन में आया की कुछ तथ्यों से भी आप को अवगत करा दूँ,असल में हमारे आस-पास ही ये सब होता रहता है पर हम ध्यान नहीं दे पाते हैं.जैसा सर्व विदित है की 60 और 70 के दशक में अधिकतर बच्चे घर पर ही बिना किसी Doctor की देख-रेख के ही पैदा हो जाते थे और घर वालों की देखभाल में रहते थे,पर अब ना तो परिवार है ना समय है और ना ही ऐसा होना चाहिये की जच्चा-बच्चा बिना किसी medical सुविधा के रहें.प्रसव कितना कठिन समय होता है इक स्त्री के लिए ये इक माँ ही समझ सकती है साथ ही नवजात शिशु को भी Doctor की देख-भाल चाहिये होती हैं.जो की पहले नहीं थी पर अब सबको सुविधा मिल जाती है इसका नतीजा ये है की जहाँ 1960 में IMR 245 थी वहीं अब 2018 में ये संख्या घट कर केवल 34 रह गयी है. इसका सीधा सा अर्थ है की सुविधाओं के अभाव में 1960 में पैदा होने वाले 1000 बच्चों में से 245 बच्चों की मृत्यु हो जाती थी जो अब सौभाग्य और विज्ञान की वजह से घट कर प्रत्येक 1000 बच्चों से हम केवल 34 बच्चे ही खोते हैं,और भविष्य में इस से भी अच्छा होगा.
बहुत गम्भीर बातें हो गयी चलिये पुनः आप को परम्परा और गीत-संगीत की ओर ले चलती हूँ. लचारी गीत हल्के-फुल्के और बहुत मनोरंजक होते हैं और इन में हमारी रीतियाँ,रिवाज और परिवार के लगभग सभी सदस्यों का ज़िक्र हो जाता है.कहीं जिठानि-देवरानी का नेग है तो कहीं रूठी ननद की हठ कहीं देवर का प्यार है तो कहीं सास-ससुर का आशीर्वाद. इतना ही नहीं इन गीतों में बहुत मीठे व्यंग व मीठी गालियाँ दूसरे पक्ष के लिए गायी जाती है.ऐसे ही हँसी-ठिठोलि और मनोरंजन से भरपूर हैं ये लोक गीत.इन्हि में से कुछ गीतों के रंग आप के लिए लायी हूँ.आशा है आप गीतों का आनंद लेंगे और मेरा विनम्र संदेश भी समझने का प्रयास करेंगे .

                         
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“कृष्ण अवतार”

श्री कृष्ण लिए अवतार सखी मामा के जेलों में...३

मामा के जेलों में सासु नहीं थीं
मामा के.....२
देवता कौन मनाये सखी...२
मामा के....२

श्री कृष्ण लिए अवतार सखी मामा के जेलों में...२

मामा के जेलों में जिठनि नहीं थी
मामा के....२
पीपली कौन पिसाए सखी....२
मामा के....२

श्री कृष्ण लिए अवतार सखी मामा के जेलों में...२

मामा के जेलों में नन्दी नहीं थी...२
मामा के....२
काजल कौन लगाये सखी...२
मामा के....२

श्री कृष्ण लिए अवतार सखी मामा के जेलों में...२

                          
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“गोरा लालन”

गोरा गोरा लालन खेल रहा आँगन
सिर पर घुंघर दार बाल
बाहर मत जाना....२

दादा घर जाना दादी घर जाना...२
दादी करेंगी तेरा प्यार...२
बाहर मत....२
गोरा गोरा....२

नाना घर जाना नानी घर जाना...२
नानी करेंगी तेरा प्यार....२
बाहर मत...२
गोरा गोरा...२

मामा घर जाना मामी घर जाना...२
मामी करेंगी तेरा प्यार....२
बाहर मत....२
गोरा गोरा....२

बुआ घर जाना फूफा घर जाना...२
बुआ करेंगी तेरा प्यार....२
बाहर मत...२
गोरा गोरा...२

गोरा गोरा लालन खेल रहा आँगन
सिर पे घुंघर दार बाल
बाहर मत जाना.

                              
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“ऐ हरी”

ललना के टूटे ना पलनवा
लालन बड़ा रोवे ऐ हरी....२
लालन बड़ा रोवे ऐ हरी
लालन बड़ा....२
ललना के टूटे....२

आपन अम्माँ होती तो हुलस के उठौति..२
सैयाँ जी के अम्माँ निर्मोहिया....२

दरदियो ना जाने ऐ हरी....२

ललना के टूटे ला पलनवा
लालन बड़ा...२

आपन भाभी होती तो हुलस के उठौति...२
सैयाँ जी के भाभी निर्मोहिया...२
दरदियो ना जाने ऐ हरी....२

ललना के टूटे ला पलनवा
लालन बड़ा...२

आपन बहिना होती तो हुलस के उठौति.२
सैयाँ जी के बहिना निर्मोहिया....२
दरदियो ना जाने ऐ हरी...२

ललना के टूटे ला पलनवा
लालन बड़ा रोवे ऐ हरी...२

                              
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“होवे ला ललनवा”

उठे ला दरदिया बड़ा ज़ोर हो जाला....२
होवे ला ललनवा बड़ा शोर हो जाला...२

हम तो चललीं अंगनवा
सासु देखे ली ललनवा
लालन चंदा चकोर हो....२
हम तो...२
कहँवा लुकाई ले के जाईं
का करी हो....२
सबकी नज़रिया लालन की ओर हो जाला..२
होवे ला ललनवा....२

हम तो चललीं दूवरिया
जिजी देखे ली ललनवा
लालन चंदा चकोर हो....२
हम तो...२
कहँवा लुकाई ले के जाईं
का करी हो...२
सबकी नज़रिया लालन की ओर हो
जाला...२
होवे ला ललनवा....२

हम तो चललीं बहरवा
नन्दी देखलि ललनवा
लालन चंदा चकोर हो...२
हम तो...२
कहँवा लुकाई ले के जाईं
का करी हो...२
सबकी नज़रिया लालन की ओर हो
जाला...२
होवे ला ललनवा...२

उठे ला दरदिया बड़ा ज़ोर हो जाला..२
होवे ला ललनवा बड़ा शोर हो जाला..२